
पाँच लघुकथा
अर्चना रॉय

लघुकथा-१
मदर…टू प्वाइंट ओ
सप्ताह में कम-से-कम चार बार फोन करने वाली माँ का काफी दिनों से फोन नहीं आने पर हाल-चाल जानने आख़िरकार विदेश में बसे बेटे ने माँ को फोन लगा ही लिया।
“हैलो माँ।”
“हाँ, बेटा।” माँ की आवाज़ में एक ख़नक थी। सुनकर उसे झटका-सा लगा। पहले जब भी माँ से बात करता उनकी आवाज़ में दुख और उदासी साफ़ महसूस होती थी।
“आपकी तबियत तो ठीक है न?”
“मैं तो बहुत अच्छी हूँ। तू कैसा है?” सुनकर उसे दोबारा झटका लगा। पहले तो उसके पूछने से पहले ही अपनी शिकायतों का पिटारा ख़ोल कर बैठ जाती थीं। जो फ़ोन रखने तक खत्म ही नहीं होता था। आज उसका हालचाल पूछ रहीं थीं।
“क्या बात है माँ, आजकल आप फ़ोन ही नहीं करतीं?”
“अरे क्या बताऊँ ये ‘दीनू’ है न! ये मुझे एक मिनट भी फुर्सत रहने दे, तभी न करूँ। कभी माँ नाश्ते का समय हो गया…माँ, सोने का समय हो गया… माँ, वॉक पर जाना है…. तो कभी दवा लेकर खिलाने मेरे आगे-पीछे घूमता रहता है।”
“माँ, ये द..’दीनू’ कौन है?”
“अरे! वही तेरा भेजा रोबोट… मैंने उसका नाम दीनू रखा है। अच्छा है न? तेरे बचपन का नाम रखा है।”
“हूँ।”
“बेटा, तूने इस रोबोट का चेहरा और आवाज अपनी तरह बनाकर बहुत ही अच्छा किया है। कभी-कभी तो मैं भूल ही जाती हूँ कि ये तू नहीं बल्कि एक रोबोट है।”
“अच्छा माँ! मुझे आपसे कुछ बात करनी है।”
“हाँ, बोल।”
“आपको तो पता है कि राधिका की डिलेवरी डेट आने वाली है। तो मैं चाहता हूँ आप यहाँ आ जाओ।”
“बेटा, मेरा आना तो संभव नहीं है।”
“पर क्यों?आप तो कब से यहाँ आना चाहती थीं। और अब आप मना कर रही हैं?”
“हाँ! मैं आना चाहती थी। क्योंकि मैं अकेली थी, और बेटे के साथ रहना चाहती थी। पर अब नहीं, क्योंकि अब दीनू मेरा बेटा मेरे पास है। उसके साथ मैं बहुत खुश हूँ।”
“माँ! … आप ये क्या बोल रहीं हैं?”
“बेटा मैं तो नहीं आ सकती हूँ, पर तेरे लिए एक सलाह जरूर देती हूँ।”
“क्या?”
“जिस तरह तूने अपने जैसा हू-ब-हू दिखने वाला रोबोट बनाया है। वैसे ही अपनी माँ की तरह दिखने वाला रोबोट भी बना ले। जो माँ वाली जरूरत पूरी कर दे….अच्छा! मैं फोन रखती हूँ। मेरी वाॅक का टाइम हो गया है। मेरा बेटा दीनू मुझे बुला रहा है।”
कहकर उन्होंने फोन काट दिया।
लघुकथा-२
सीढ़ी
उनके दिन के चैन के साथ, रातों की नींद भी उड़ गई थी। एक वायरल वीडियो ने महज चंद दिनों में ही उनकी बुलंदी को अर्श से फ़र्श पर ला दिया था। उसे बचाने उन्होंने क्या कुछ नहीं किया,…मीडिया कांफ्रेंस रखी,…खुला मंच रखकर घोषणा पत्र जारी किया,..और भी बहुत कुछ,पर वे अपने व्यापार को डूबने से न बचा पाए। दशकों से कमाई इज्जत चंद दिनों में धूल हो गई और वे कुछ न कर सके थे। एक आखिरी कोशिश के लिए आखिर वहाँ पहुॅंच ही गए जहाँ वे जाना नहीं चाहते थे।
“तुम्हारा मैंने क्या बिगाड़ा है?”
“जी,…मैं कुछ समझा नहीं?”
“मेरी कंपनी के उत्पाद एकदम शुद्ध हैं। उनमें कोई मिलावट नहीं है। यह देखो इंडियन लैबोरेट्री का प्रमाण पत्र।”
“ये आप मुझे नहीं जनता को जाकर दिखाइए।”
“जनता सबूतों को कहाँ देखती है, उसके लिए तो उसके प्रिय अभिनेता ने जो बोल दिया उनके लिए वही सच हो जाता है। इसलिए यह सबूत मैं आपको दिखाने लाया हूंँ कि शायद आप…”
“सर, इनकी जरूरत नहीं है। मैं जानता हूँ, आपकी ईमानदारी को।” जवाब सुनकर वे प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगे।
“हाँ भाई! सच कह रहा हूँ। विश्वास न हो तो देख लो आप के ब्रांड के प्रोडक्ट ही मैं इस्तेमाल करता हूंँ।”
” अच्छा?…तो फिर ऐसा झूठा विज्ञापन क्यों किया?”
“वह क्या है न सर, आजकल मेरा करियर कुछ खास आगे बढ़ नहीं रहा था,इसलिए!…”
“आपने अपना करियर आगे बढ़ाने के लिए मेरे दादाजी के नाम के ब्रांड को बदनाम कर दिया।” कहते हुए उनकी आँखों में नमी तैर गई।
“अगर ऐसा था तो, मैं ही क्यों?…किसी बेईमानी करने वाले को चुनते।”
“वह क्या है न सर? बेईमान को बेईमान कहने से वह पब्लिसिटी नहीं मिलती जो ईमानदार को बेईमान…”-कहते हुए वह ढ़िठाई से हॅंसने लगा।
लघुकथा-३
डोरियाँ
अस्पताल के बेड पर पड़े -पड़े दुख और ग्लानि से उनका दिल बैठा जा रहा था। जब से उन्हें पता चला कि उनके आपरेशन के लिए बेटे ने घर गिरवी रख पैसे जुटाये हैं, उनके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वे उस घड़ी को कोस रहे थे, जब उन्होंने बेटे से मिलने गाँव से शहर आने का फैसला किया था।
न आता तो कम- से- कम ये एक्सीडेंट न होता, न ही बेटे के सिर पर मुसीबतों का पहाड़ टूटता। सोच- सोच कर उनका बुरा हाल था। पैर टूटने से कहीं ज्यादा उन्हें घर गिरवी रखने का दर्द हो रहा था।
बेटे- बहू को सामने से आते देख उनका जी चाहा कि अभी धरती फट जाए और वे उसमें समा जाते। मैं अपने बेटे से कैसे नजरें मिला सकूँगा,…बहू मेरे बारे में क्या सोच रही होगी?
पिता तो वो होता है जो बच्चों के दुख- तकलीफ दूर करता है। और एक वो है जिसने अपने बच्चों को ही मुसीबत में डाल दिया है। काश! एक्सीडेंट में मैं मर क्यों न गया, मन- ही- मन अपने आप को लानतें दे रहे थे।
“बेटा मनीष,..बहू मुझे मा..आ. फ..करना…. ” हाथ जोड़कर वे हिलक उठे।
“अरे! पिताजी, ये आप क्या कर रहे हैं..” बेटे ने झट उनके हाथों को थाम लिया।
“बेटा मुझे पता ही नहीं चला, कब पीछे से आकर कार ने टक्कर मार दिया…. ”
“पिताजी सड़क हादसा तो किसी के साथ भी हो सकता है… इसमें आपकी कोई गलती नहीं है।” बहू ने कहा।
“पर बेटा!मेरी वजह से घर….” कहते हुए उनकी हिचकियाँ बॅंध गयीं।
“कोई बात नहीं पिताजी आपके साथ और आशीर्वाद से ऐसे कई घर बना लेगें। ” बेटे ने ढाढ़स बंधाया।
“हम्म…” बेटे की बातों ने उनके मन पर पड़े बोझ को हल्का कर दिया।
दर्द और कमजोरी की वजह से उनकी आँखें मुँद रहीं थीं, इसलिए वे अपनी आँखे बंद कर शांत भाव से लेट गए।
“पिताजी!…आप बिल्कुल भी चिंता मत कीजिये …. सब ठीक हो जाएगा। ” आगे बढ़कर बहू ने ससुर के माथे पर प्यार से हाथ फेरकर सहलाते हुए कहा।
ममता भरा नर्म स्पर्श पाकर उन्होंने आँखें खोली, सामने देखकर वे चकित रह गए… अचानक उन्हें बहू के चेहरे में अपनी माँ की छवि दिखाई दे रही थी।
वो भी तो ऐसे ही उनके सिर पर हाथ फेर सारी तकलीफें हर लेती थी।
वहाँ खड़ी नर्स की आँखें बरबस भीग गयीं…
एक तीस साल की माँ का, साठ साल के बेटे को दुलार करते देखकर।
लघुकथा -४
अँगारे
“अम्मा, पेट में बड़ी जलन हो रही है।” सूखे होठों पर बार- बार जीभ फिराकर गीला करने की कोशिश कर, पेट को कसकर पकड़कर वह कराह उठा।
बेटे के कृषकाय शरीर, कोटरों में धसीं आँखें, पीला पड़े चेहरे को देख उसका कलेजा मुँह को आ गया।
“हाँ बेटा रु…क जा, अभी घडे़ का ठंडा पा…नी देती हूँ।” वह अपनी रूलाई रोकते हुए बमुश्किल बोल पाई।
“अम्मा पानी नहीं कुछ खाने को चाहिए है।”
“हाँ, अभी तेरे बापू कुछ लेकर आते होंगे।”
वह बेटे की हालत देख वह बदहवाश- सी बार -बार झोपडी के दरवाज़े तक आती और निराश हो वापिस बेटे को गोद में लिटाकर सहलाने लगती।
आखिर वह क्या करे, अपनी लाचारी पर उसे रोना आ रहा था।
पिछले तीन दिनों से रोज मंत्री के गुर्गे बस्ती के सभी मर्दों को दारू का लालच देकर प्रचार के लिए हांककर ले जा रहे थे।चाहकर भी वह पति को जाने से रोक नहीं पा रही थी।
बनिए ने भी कई बार हाथ- पाँव जोड़कर मिन्नतें करने के बाद भी, पिछली उधारी चुकता किये बिना और राशन उधार देने से साफ मना कर दिया था।
“काशी की तबियत बिगड़ती जा रही है, घर में भी अन्न का दाना नहीं है, काशी के बापू कब आओगे…।” आग से तपते बेटे को गोद में लिए वह मन- ही- मन उधेड़बुन में लगी थी।कि तभी
“अरे! काशी की अम्मा, देखो अखबार के पहले पन्ने में हमारी फोटो छपा है, वह भी मंत्री जी के साथ।” घर में घुसते ही अखबार दिखाकर हल्कू खुशी से बोला।
“हमारा मंत्री जी की रैली में जाना बड़ा काम आया।”
“…..”
पर पत्नी के कुछ न कहने पर उसने फिर कहा।
“अरे! गौर से तो देख, फोटो में मंत्री जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा है।” हल्कू ने हुलस कर कहा।
“अब हम भी बड़ा फेमस हो गया हूंँ। सब लोग हमें पहचान कर बधाई दे रहे हैं। आज हम बहुत खुस हैं।
“काश! तुम्हारी ई पहचान, हमारे काशी के पेट की जलन शांत कर देती।” कभी ठंडे चूल्हे की ओर तो कभी अपने बेटे की पथराई आँखों को देखते हुए, वह भर्राई आवाज़ में बोली, और उसकी आँख से गर्म आँसू टपक गया।
लघुकथा-५
गाँधी गिरी
गाँधी चौक पर स्थापित बापू की आदम कद मूर्ति के सामने सड़क के उस पार बने मंदिर के बाहर, सुबह से ही शहर भर के गरीब और भिखारियों का जमावड़ा लगा था। और हो भी क्यों न, आज ही के दिन हर साल, नेता जी अपने जन्मदिन के उपलक्ष्य में, पूजा करने के बाद सभी को अपने हाथों से खाने का सामान देते थे।
रशीद भी अपने बाल- बच्चों सहित खड़ा, नेता जी के मंदिर से बाहर आने का इंतजार कर रहा था। अभी नेताजी पूजा समाप्त करके प्रसाद वितरित करने ही वाले थे कि, अचानक तेज तूफान के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई और अफरा-तफरी मच गई। लगातार बारिश होने और अपने तय कार्यक्रम में जाने देर होती देख नेताजी खाने का सारा सामान वही, भिखारियों के मुखिया गंगाराम को देकर सभी को बाँटने की हिदायत देकर कार में बैठकर धुआँ उड़ाते हुए निकल गए।
” चलो भाइयों,… जल्दी से लाइन लगाकर खड़े हो जाओ और एक-एक कर मेरे पास आकर खाना लेते जाओ।”- बारिश बंद होते ही गंगाराम ने सब से कहा।
बाकी सभी तो लाइन में खड़े हो गए, परंतु, रशीद निराश होकर अपने परिवार सहित, वापस घर की ओर मुड़ गया, क्योंकि गंगाराम से उसकी कुछ खास बनती नहीं थी।
अभी कुछ कदम आगे गया ही था कि
“कहाँ जा रहे हो? अपना खाना तो लेते जाओ।”
उसने पीछे मुड़कर देखा गंगाराम हाथ में खाना के पैकेट लिए खड़ा था।
देखकर रशीद प्रश्नवाचक नजरों से उसकी तरफ देखने लगा।
“ले लो इस पर तुम्हारा ही हक है।”
“पर मैं तो तुम्हारा ….”
“दोस्त,… ये खाना जरूर नेताजी का है, पर मैं नेतागिरी नहीं करता।”- हँसकर कहता हुआ गंगाराम, दूसरे भिखारियों को पैकेट देने लगा। ये देख चौक पर लगी गाँधी जी की मूर्ति मुस्कुरा उठी।

पाँच लघुकथा
मधु जैन,
593 संजीवनी नगर जबलपुर
482003 म.प्र.
9407182120

लघुकथा-१
रफ कापी
हताश सी वह घर आकर जमीन पर बैठ गई। टेबिल के नीचे से कापी उठाते हुए “गुड्डो तेरी यह कापी हमेशा इधर उधर पड़ी रहती है काम की नहीं है तो अलग कर। ”
अम्मा के हाथ से कापी लेते हुए “बहुत काम की है सारे विषयों का बोझ यही तो उठाती है।”
“फिर इसमें भी कवर क्यों नहीं चढ़ाती।”
“अरे अम्मा, यह रफ कापी है फेयर थोड़ी न है।”
“अम्मा बहुत थकी लग रही हो, क्या आज काम ज्यादा था?”
“न रे! थकी तो न हूँ, वो नीलिमा दीदी..”
“वही न तुम्हारी फेवरेट दीदी।”
“वो है ही इतनी अच्छी उसने कभी मुझे काम वाली नहीं समझा। हमेशा घर का एक सदस्य ही माना।”
“क्या हुआ उन्हें?”
“तेज बुखार में भी दीदी अकेले काम कर रहीं थीं।”
“दीदी आप आराम कीजिए काम मैं करती हूँ कहकर बिस्तर पर जबरन लिटाया और क्रोसिन खिलाई। फिर मैंने माँ जी को चाय दी, तो बोली।”
“नीलू कहाँ है? जो तू चाय लाई।”
“दीदी को बुखार है वो सो रहीं हैं।”
चाय देकर बाहर आई तो बेबी दी “भाभी भाभी” चिल्ला रही थी
“बेबी दी, दीदी को तेज बुखार है सो रही है।”
“उठ जाए तो कहना मेरा गुलाबी सूट प्रेस कर दे।”
“और मेरी नीली शर्ट भी” बबलू ने कहा।
“घर में किसी ने भी दीदी को जाकर नहीं देखा कि कैसी तबियत है।” मन कड़वाहट से भर गया।
“ओह !!”
“पर अम्मा उनकी देवरानी भी तो है न।”
“वह नौकरी करती है इसलिए वह उस घर की फेयर कापी है और दीदी रफ कापी।” कहते हुए चेहरा गुस्से और बेबसी से भर उठा।
लघुकथा-२
पालनहार
सूरज आँखें दिखा रहा था और मेरी आँखें ग्राहकों का इंतजार कर रही थीं। खाली बैठे- बैठे झपकी आने लगी थी। तभी सड़क पर हो रही हलचल पर नजर गई। खानाबदोश परिवार अपने करतब दिखाने की तैयारी कर रहा था। पीठ पर बच्चे को बांधे महिला ढोलक बजा रही थी। पुरुष झांझर बजाते हुए गाना गा रहा था। और छोटी सी बच्ची गाने पर ठुमके लगा रही थी।
लोगों का ध्यान बच्ची पर नहीं, दस बारह फीट ऊंची बंधीं पतली सी रस्सी पर करतब दिखाते बालक पर था। बालक दस वर्ष के लगभग का दुबला-पतला था। सभी सांस रोके उसके हैरतअंगेज खेल का आनंद ले रहे थे। करतब खत्म होते ही लोगों के हाथ जेबों पर पहुँच चुके थे।
अब वे लोग बाजू वाली दुकान के शैड के नीचे खाना खाने बैठ गये, मेरा ध्यान उन्हीं पर था।
मैंने राहगीरों के लिए एक मटके में पानी भरकर दुकान के बाहर रखा हुआ था।
खाना खाने के बाद वह बालक पानी लेने आया तो मैंने पूछा।
“तेरा नाम क्या है ?”
झट से बोला “मंगू”
“तू तो बहुत बढ़िया करतब दिखाता है। कहाँ से सीखा ?”
“अपने बड़े भैय्या से।”
“कहाँ है वो ?”
“वो नहीं है, रस्सी से गिरकर मर गया।” कहते हुए उसकी आँख भर आई।
बात को बदलते हुए मैंने कहा “तू इतना कम खाना क्यों खाता है जबकि मेहनत बहुत करता है।”
सिर झुकाए हुए बोला ” ज्यादा खाऊँगा तो वजन बढ़ जाएगा करतब कैसे दिखाऊंगा ?”
“तुझे करतब दिखाना अच्छा लगता है।”
“नहीं, पर मैं करतब नहीं दिखाऊंगा तो सबका पेट कैसे भरेगा ”
उससे बातें करते- करते मैं भावुक हो उठा था। मैंने उसे दस का नोट दिया।
“करतब के पैसे तो अपने दे दिए थे।”
“इतनी देर तुझसे बातें की न उसके पैसे हैं।”
पैसे लेते हुए उसके चेहरे की क्षणिक मुस्कान मुझे सुकून दे गई।
लघुकथा-३
अनपढ़
मैं प्लेटफार्म पर ट्रेन के इंतजार में चहल कदमी कर रहा था तभी उद्घोषणा हुई ट्रेन एक घंटे लेट है। मैं बेंच पर आकर बैठ गया।
इस ट्रेन से माँ पहली बार मेरे पास आ रही थी । माँ की याद आते ही मन खो गया। मैंने बचपन से ही माँ को पापा की एक नौकरानी के रूप में देखा देखा है। पापा की हर बात को मानना, कभी भी कोई जवाब ना देना और यदि कभी कुछ कहना चाहा तो फिर तो पापा का कहना “तुम अनपढ़ कुछ नहीं समझोगी।”
मैं छोटा था तो समझता था माँ पढ़ी-लिखी नहीं है पर एक दिन मंदिर में माँ को रामायण पढ़ते देख मैंने कहा “माँ तुम्हें तो पढ़ना आता है।”
माँ ने कहा “चार अक्षर पढ़ने से कोई पढ़ा लिखा नहीं हो जाता।”
उस दिन पापा ने माँ को फिर अनपढ़ कहा तो मैं बोल पड़ा “पापा माँ को पढ़ना आता है।”
पापा ने मुस्कुराते हुए कहा “देखा, बेटा अब माँ की वकालत करने लगा है।”
माँ को पहली बार मुस्कुराते हुए देखा था। माँ से मेरी बहुत कम बात होती थी लेकिन जब मैं घर से हॉस्टल जाता था तो माँ बहुत सारे पकवान बनाकर रखती थी और अपने बचत के कुछ पैसे भी मेरे हाथ में रख देती थी।
मैंने शहर में पढ़कर वहीं पर नौकरी भी कर ली। मेरे ऑफिस में ही रिया भी नौकरी करती हैं। हम दोनों एक दूसरे को बहुत पसंद करते हैं किंतु विजातीय होने के कारण मैं जानता था कि पापा अनुमति नहीं देंगे। रिया ने अपने पिता को मना लिया किंतु मैं बात ही नहीं कर पाया।
रिया के पिता ने इसी शर्त पर हाँ कहा कि मेरे माता- पिता रिया का हाथ मांगने आएंगे।
जब मैंने पापा से इस संबंध में बात की तो वह गुस्से से लाल-पीले होते हुए बोले “एक विजातीय से शादी कतई नहीं ?
काफी समझाने के बाद तैयार हुए।
बोले “जाओ लड़की के पिता से कहो आकर मुझसे बात करें।”
मैंने कहा “वह नहीं आएंगे आपको ही जाकर बात करना होगी।”
पापा तो लगभग चिल्लाते हुए बोले “फिर तो यह शादी हो ही नहीं सकती? मैं लड़के वाला होकर उनके दरवाजे पर जाऊँ असंभव है।”
तभी माँ ने मेरी ओर देखा और बोली “बेटा मैं चलूंगी उनके दरवाजे लड़की का हाथ मांगने।”
पापा ने घूर कर माँ की और देखा और कहा “तुम मेरे विरुद्ध जाओगी।”
“हाँ, बेटे की खुशी के लिए आपके तो क्या मैं तो भगवान के विरुद्ध भी चली जाऊंगी।”
तभी ट्रेन के आने का संकेत हुआ मैं दौड़ कर पहुँचा। माँ के पैर छूते हुए बोल पड़ा
“माँ तुम अनपढ़ नहीं हो।”
लघुकथा-४
नैनों की भाषा
वह मुठ्ठी में पैसों को दबाये बोझिल कदमों से घर की ओर चला जा रहा था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था घर पहुँच कर बच्चों और पत्नी को क्या जवाब देगा। सांत्वना देने के लिए अब माँ भी घर पर नहीं है। पत्नी की किचकिच से तंग आकर माँ को वृद्धाश्रम छोड़ आया था। मूर्ति बनाने की कला उसे विरासत में मिली थी। वह मूर्ति बनाता था और माँ हमेशा की तरह मूर्ति के चेहरे की भाव भंगिमाओं को सधे हाथों से उकेरती थी। पत्नी का काम मूर्ति के जेवरों और कपड़ों की सज्जा करना था। दशहरा पर दुर्गा जी की मूर्तियों की बिक्री से उसका साल भर का राशन और सभी के कपड़ों का इंतजाम हो जाता था पर इस बार…
घर पहुँचते ही पत्नी ने मुस्कुरा कर चाय का गिलास पकड़ाया।
“सुनो! इस बार मैं माँ के हिस्से की दो साड़ियाँ यानि चार साड़ियाँ लूंगी” इठलाती हुए बोली।
“चार क्या इस बार तो मैं एक भी साड़ी न दिला पाऊँगा।”
” क्यों ”
” इस बार आधी मूर्तियांँ भी नहीं बिकी।” कहते हुए चेहरे दर्द उभर आया
“ऐसे कैसे हो सकता है हमारी मूर्तियाँ तो हाथों- हाथ बिक जाती थी।”
“हाँ, पर लोगों का कहना है इस बार मूर्तियों की आँखों में वो आकर्षण नहीं है जो हमेशा रहता था। उदास आँखों वाली मूर्तियाँ उन्हें नहीं चाहिए।”
“पर चेहरा तो आपने हमेशा की तरह ही बनाया था फिर क्यों…? ”
जब भी आँखों में रंग भरता हूँ तो माँ की आँखे सामने आ जाती हैं।
“जब माँ की आँखों में उदासी हो तो दुर्गा माँ कैसे मुस्कुरा सकती हैं।”
लघुकथआ-5
शगुन
मालती कल ही अस्पताल से बहू को लेकर लौटी थी और आज किन्नरों की टोली उसके दरवाजे पर! बहू को लड़की जो हुई है! काफी बहस के बाद टोली लौट रही है। सीमा दरवाजे पर खड़ी देख रही है। उसने उन्हें रोका।
“शब्बो, इधर आना।”
“क्या बात है दीदी?”
“कितने पैसे लिए तूने मालती से?”
“2500 रुपए दीदी।वो तो लड़की है। इसलिए मान गई।लड़का होता तो 5000 से कम न लेती।”
“उन्होंने तुझे 2500 रुपए दे दिए!”
“क्यों न देती? हमारी बद्दुआओं से सभी डरते हैं।”
“एक बात कहना चाहती हूं बुरा न मानो तो!”
“अरे दीदी! एक आप ही तो हैं जो तीज त्यौहार में बिना मांगे जी खोलकर देती हो। आपकी बात का बुरा कैसा।”
“तुम तो बद्दुआ का डर दिखाकर पैसा ले आयीं, लेकिन इन पैसों के साथ अपने लिए कितनी बद्दुआएं लाई हो मालूम है?”
“मैं समझी नहीं दीदी।”
“मालती का बेटा दैनिक वेतनभोगी है,घर का खर्च मुश्किल से चलता है।ऊपर से डिलेवरी आपरेशन से।”
“नार्मल डिलीवरी में डाॅ की कमाई नहीं न होती दीदी!”
“कल मैं मालती से मिली थी। उसने बताया था, डिलीवरी के बाद तीन हजार रुपए बचे हैं जिससे वह बहू की दवाइयां और कुछ मेवा लाने वाली है।”
शब्बो आपस में बात करने के बाद पुनः मालती के दरवाजे पर पहुंची।
“अब क्यों आईं हो? और नहीं दे सकती मैं!”
“अरे नहीं, लक्ष्मी को लेकर बधाई करनी है।”
वे सभी नवजात को लेकर खूब नाचते गाते हैं और ढेरों आशीष देते हैं।साथ ही 3000 रुपए देते हुए,बोले- “यह हमारी तरफ से बच्ची का शगुन।”
मालती का हाथ स्वतः ही उसके सिर पर पहुंच गया।
शब्बो को तो पहली बार इतना बड़ा शगुन मिला।

पाँच लघुकथा
सीमा व्यास

लघुकथा-१
बारी
घर्र र्र र्र … करती जीप सुदूर डाक बंगले के सामने रुकी। चार जोड़ी चमचमाते काले बूटवाले उतरकर भीतर गए। बाहर दाना चुगते मुर्गे-मुर्गियों के कंठ सूख गए। आज जाने किसकी बारी ?
काला मफलर लपेटे चौकीदार पत्थर पर चाकू घीसने लगा।
पास की झोपड़ी से झाँकती लड़कियाँ फुसफुसाईं। आज जाने किसकी बारी ?
फ्रिज में रखी बोतलें आपस में टकराईं। आज जाने किसकी बारी।
काले मुर्गे की बारी आई। ब्लेक लेबल बोतल की बारी आई। काली सलवारवाली की बारी आई।
देर रात नशे में बेसुध चार जोड़ी चमचमाते बूटवालों को लेकर घर्र… र्र…र्र करती गाड़ी निकल गई।
काला मफलर लपेटे चौकीदार अपनी बारी का इंतजार ही करता रहा गया।
लघुकथा-२
कचरा
घने बादल छाए थे। उमस बढ़ गई थी। मेरा मन कहानी पढ़ने में नहीं लग रहा था। उठने का मन बनाया ही था कि मोबाइल बजा। ननद की बहू श्वेता का फोन था। बात खत्म होते ही मन कसैला हो गया। ननदजी अब बिस्तर पर हैं तो मेरी याद आ रही है। मेरी डिलेवरी के समय तो नवरात्रि के कड़क उपवास होने से नहीं आई। और बिट्टू का पैर फ्रेक्चर हुआ था तब बेटे की परीक्षा का बहाना बना दिया।
मैं भी उनके घर न जाने का बहाना सोच ही रही थी कि पैरों के नीचे गीला महसूस हुआ। मैं चौंक गई। बाहर तेज़ बारिश शुरू हो गई थी और पानी छत के चढ़ाव से होता हुआ कमरे तक आ गया गया था। मैं दौड़ती हुई ऊपर गई। छत का पानी निकालने वाले पाइप की जाली में कचरा फँसा था। मैंने जल्दी से पत्ते और कचरा हटाया। बारिश का पानी अब पाइप में से जा रहा था।
नीचे आते तक मैं भीग गई थी। बाल झटककर पोंछते हुए मैंने साड़ी बदली। पति को मेसेज किया, “श्वेता का फोन आया था। मैं दीदी के घर जा रही हूँ। शाम को बात करती हूँ।”
कचरा जितनी जल्दी साफ हो जाए, उतना अच्छा।
लघुकथा-३
सलवटें
पिछले कुछ दिनों से नया ही शौक चर्राया है मुझे। ताजा़ प्रेस करवाकर गर्मागर्म शर्ट पहनने का। इस नये फ्लेट के नीचे ही प्रेस वाले की दुकान है। तो अक्सर हाथ में शर्ट लिए पहुँच जाता हूँ। आज कलफ़ लगा नीला शर्ट लेकर गया । प्रेस वाले ने नमस्कार कर हाथ का कपड़ा प्रेस किया और फिर मेरे हाथ से शर्ट लिया। उस पर पानी छींटते हुए बोला,” कपड़े की अकड़ खत्म करने के लिए नमी बहुत जरूरी है। नम कपड़ा जरा देर में सीधा हो जाता है। साब, कपड़ा हो या जिंदगी सलवटें खत्म करने के लिए नमी मिलना चाहिए।”
मैं उसकी समझदारी भरी बातें सुन चौंक गया। बोला, “तुम तो बड़ी गहरी बात कर रहे हो। कहाँ से आया यह नमी का फलसफा ? शुरू से यही काम करते हो या फिर…”
” काम तो एक ही चुना था साब देशसेवा का। इस खातिर शादी न करने का निर्णय भी ले लिया था। पर किस्मत खराब थी। भांति-भांति के लोग मिले पर नमी नदारद। जीवन की सलवटों ने सब छुड़ा दिया।”
” तो सब छोड़कर यह काम चुना ? सलवटें दूर करने का ?”
“नहीं साब। सलवटें दूर कर दो रोटी के पैसे कमाता हूँ। शाम से रात तक बच्चों से बातें करता हूँ । उनमें नमी बोता हूँ। ताकि कुछ फसल तो ऐसी निकले जो किसी के जीवन की सलवटें दूर कर सके।”
मैं गर्म शर्ट पहनते हुए बहुत ठंडक महसूस कर रहा था।
लघुकथा-४
अब न नसैहौं
नागेश को बहुत देर से हिचकी आ रही थी। उसने हिचकी रोकने के उपाय शुरू किये। पानी पीया, मिश्री मुँह में डाली। पर सब व्यर्थ।
दादी कहती थी,अपना कोई करीबी जिसे तुम भूल गए हो, याद करे तो हिचकी आती है, और उसका नाम लेते ही हिचकी रुक जाती है। सोचते हुए उसने अपने करीबियों को याद करना शुरू किया। भैया,भाभी,भतीजे,भांजे, भांजी, काका,बुआ…। जो करीबी लगा उसे भी,जो न लगा उसे भी। तभी मोबाइल की घंटी बजी। उठाया तो उस ओर से किसी ने ऊँची आवाज़ में पूछा, “कौन बोल रहा है?”
नागेश अचकचा गया। उधर से फिर पूछा गया,”बता न, कौन बोल रहा है ?”
नागेश ने जोर से कहा, “मैं…मैं नागेश महतो बोल रहा हूँ, नागेश महतो।” उधर से “राँग नंबर” आवाज़ आई और फोन कट गया।
आश्चर्य! नागेश की हिचकी रुक गई। उसने दो बार थूक निगलकर देखा, सच में ही हिचकी रुक गई थी। हैं ? मेरा नाम लेने से मेरी ही हिचकी… यानी मैं ही मेरा सबसे करीबी हूँ और…
दीर्घ नि:श्वास के साथ कुर्सी पर बैठते हुए नागेश सोचने लगा,पत्नी के जाने के बाद मैं खुद को भूल ही तो गया हूँ। न समय पर दवा लेता हूँ, न सैर को जाता हूँ। खाने का क्रम भी बेढब हो गया है। यह भूल ठीक नहीं।
नागेश महतो छड़ी उठा सांँझ की सैर के लिए निकल पड़ा।
लघुकथा-५
किश्तवार वैवाहिक विज्ञापन
17-4-2012
27 वर्षीय सनाढ्य ब्राह्मण, इंजीनियर ,वार्षिक आय 8 लाख, सुदर्शन, स्मार्ट,निर्व्यसनी युवक हेतु सजातीय सुंदर, सुशील, सुशिक्षित, गृहकार्य में दक्ष ,अंग्रेजी बोलनेवाली, कुलीन वधू की आवश्यकता है। इकलौती संतान को प्राथमिकता। विज्ञापन उत्तम चयन हेतु।
12/1/2013
29 वर्षीय सनाढ्य ब्राह्मण, इंजीनियर,वार्षिक आय 9 लाख, सुदर्शन, स्मार्ट,निर्व्यसनी युवक हेतु सुंदर, सुशील, सुशिक्षित, गृहकार्य में दक्ष वधू की आवश्यकता है। सर्वब्राह्मण स्वीकार।
3/4/2015
31 वर्षीय इंजीनियर ,वार्षिक आय 9.5 लाख, स्मार्ट युवक हेतु सुशिक्षित, गृहकार्य में दक्ष वधू की आवश्यकता है। दहेज विरोधी परिवार। जाति बंधन नहीं।
2/2/2018
34 वर्षीय इंजीनियर,वार्षिक आय सात अंकों में युवक हेतु शिक्षित वधू की आवश्यकता है। निःसंतान, तलाकशुदा मान्य। जाति बंधन नहीं। गृहकार्य स्वैच्छिक। परिवार में किसी तरह का बंधन नहीं।
1/1/2020
स्मार्ट इंजीनियर युवक हेतु योग्य वधू की आवश्यकता है। आय सात अंकों में। निजी बंगला,गाड़ी। कोई पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं। कोई बंधन नहीं। लेन-देन रहित विवाह। शीघ्र संपर्क करें।
7/1/2021
इंजीनियर युवक हेतु विवाह प्रस्ताव आमंत्रित हैं। विधवा, तलाकशुदा, संतान सहित युवतियों के प्रस्ताव स्वीकार। कोई बंधन नहीं। कृपया शीघ्रातिशीघ्र संपर्क करें।
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