अर्चना त्यागी, चितरंजन गोप लुकाटी, अर्चना कोचर


पाँच लघुकथा

अर्चना त्यागी
रुड़की, उत्तराखंड

लघुकथा-१
“अधूरी प्रार्थना”
गोविंद नाम से ही गोविंद नहीं है, मन से भी गोविंद जी का बड़ा भक्त है। रोज़ सुबह काम पर जाने से पहले भगवान के सामने हाथ जोड़ना नहीं भूलता है। घर वापिस आते ही गोविंद जी को स्मरण करना उसकी आदत में शामिल है। बस एक ही शिकायत रहती है उसे। ,” गोविंद जी मेरी बात तो मानते हैं लेकिन समय निकलने के बाद। मेरी श्रृद्धा को गोविंद जी उस स्तर का नहीं मानते हैं जिससे तुरंत आशानुकूल परिणाम मिल जाए।” गोविंद जब भी अपने इष्ट देव गोविंद जी के सामने जाता है, यही बात उसके मन में आती है। उसकी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आता है। वही दिन भर की भाग दौड़ और गोविंद जी से शिकायत।
घर में गोविंद अपने दादाजी से सबसे अधिक प्यार करता है। उन्हे परेशान देखकर वह सारे काम धाम छोड़कर बस उनकी तीमारदारी करने लगता है। इसीलिए दादाजी अपनी बीमारी के बारे में कभी गोविंद से बात नहीं करते हैं।
शाम को गोविंद घर वापिस आया तो दादाजी नहीं मिले। मां ने यही कहा कि वो खाना खा कर सो रहे हैं। गोविंद दोस्तों के साथ फिल्म देखने चला गया। वापिस आया तो चाचा खाने का टिफिन लेकर कहीं जा रहे थे। गोविंद पूछना चाहता था लेकिन चाचा जल्दी से निकल गए। गोविंद को थोड़ा शक हुआ। बिना कुछ बोले वह सीधे दादा के कमरे की ओर चल पड़ा। कमरा बाहर से बंद था। गोविंद का शक और भी बढ़ गया लेकिन वह नहीं माना और दरवाज़ा खोलकर दादा के कमरे में चला गया। दादा वहां नहीं थे। पीछे से मम्मी भी कमरे में आ गई थी।
” तुम्हारे दादा को सीने में दर्द की शिकायत थी इसलिए डॉक्टर ने हॉस्पिटल में एडमिट कर लिया है। रात भर वहीं रहेंगे। कल शायद छुट्टी मिल जायेगी।” मां ने बताया तो गोविंद को गुस्सा भी आया लेकिन एक खयाल उससे भी तेज़ी से आ रहा था। वह घर में बने मंदिर में जाकर गोविन्दजी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर मन ही मन बोला ,” गोविन्दजी दादा के साथ ऐसा नहीं। आप उनके हिस्से की परेशानी मुझे दो लेकिन उनको ठीक कर दो।” गोविन्दजी पहले की तरह ही मुस्कुरा रहे थे। गोविंद भारी मन से अस्पताल चला गया। रात भर बाहर बैठा रहा। दादाजी आईसीयू में थे। डॉक्टर भी उनकी स्थिति के बारे में कुछ स्पष्ट नहीं बोल पा रहे थे। रात में बेंच पर बैठे बैठे गोविंद की आंख लगी तो सपने में दादाजी ही दिखे।
” चलो गोविंद, गोविन्दजी की पूजा अर्चना करते हैं। गीता का पाठ कर लेते हैं। तुम मुझे गीता पढ़कर सुनाना।” गोविंद दादाजी को ठीक देखकर बहुत खुश था लेकिन गोविन्दजी से नाराज़ था।
” दादा, गोविन्दजी मेरी प्रार्थना पर ध्यान नहीं देते हैं। ऐसा नहीं होता तो आपको बीमार नहीं करते।”
” प्रार्थना सच्चे मन से करोगे तो ज़रूर पूरी होगी। हो सकता है तुम जल्दी जल्दी में अधूरी प्रार्थना ही करते हो। सोचकर देखना।” गोविंद की आंख खुली तो दादाजी सामने नहीं थे। लेकिन उसकी समझ में सब आ गया था। सुबह होते ही गोविंद अस्पताल के मंदिर में बैठकर प्रार्थना कर रहा था।
दादाजी को तीन दिन बाद छुट्टी मिल गई। गोविंद उन्हे लेकर घर पर आ गया। अब रोज़ दादाजी को गीता पढ़कर सुनाना उसका नियम बन गया था। गोविन्दजी से नाराजगी भी अब नहीं रही थी।

***

लघुकथा-२
” प्रीतिभोज”
लगभग एक साल बाद मेरे मित्र दिनकर का बंगला बनकर पूरा हुआ। आज़ व्हाट्सएप पर संदेश आया। गृहप्रवेश की तिथि लिखी हुई थी। शाम को फ़ोन भी आया। सपरिवार पधारने का विनम्र आग्रह किया था। पूरा परिवार खुश था। सभी लोग उत्साहित थे। उत्साह का सबसे बड़ा कारण था गृहप्रवेश का दिन। दिनकर जी अपने नाम को चरितार्थ करते हुए अपने घर पर होने वाले प्रमुख आयोजन रविवार को ही रखते थे। रविवार को सभी घर पर होते हैं और आनंद के साथ किसी भी समारोह में उपस्थिति दर्ज कराई जा सकती है। दिनकर जी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ दोपहर को गृहप्रवेश में पहुंच गए।
शानदार बंगला और पूरी तरह सज़ा हुआ। फूलमालाएं, बंदनवार आदि आदि। बंगले के बाजू में एक बड़ा प्लॉट खाली था, उसी की सफाई करवाकर खाने की व्यवस्था की गई थी। शहर के सबसे बड़े केटरर को खाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। दूर से ही खाने की खुशबू आ रही थी। लोग खाना खाकर निकल रहे थे। आजकल रुकने का समय किसके पास होता है ? समझदारी भी हो गई है। आयोजन करने वाले की मजबूरी सब समझते हैं। किसे इतने लोगों से एक साथ बात करने का मन होता है ? बुलाया तो अपना ऊंचा स्तर दिखाने के लिए ही जाता है। जितने ज्यादा लोग आएंगे उतना ही पड़ोसियों पर रौब जमेगा।
दिनकर जी ने पूरे बंगले की परिक्रमा की। वास्तु की प्रशंशा की। पूरे मन से दोस्त को शानदार आवास की बधाई दी। दोस्त ने भी सबको दिखाया कि दिनकर जी से अधिक प्यारा अतिथि उसके लिए कोई नहीं है। दोस्त और उसकी पत्नी उनके साथ ही खाना खाने बैठे। खाना वापिस गर्म करवाया गया। मेहमान लगभग सभी जा चुके थे। खाना परोसने वाले और पत्नी के साथ दिनकर जी, दोस्त और उसकी पत्नी। बच्चे बंगले की वीडियो बनाने में व्यस्त थे। इतना सुंदर घर उन्होंने पहली बार देखा था। बंगले का इंटीरियर भी डिजाइनर से ही करवाया गया था।
“हमें भी खाना खाना चाहिए।”
मुंह में उंगली डाले दो छोटे बच्चे पास में खड़े हुए बोल रहे थे।
दिनकर जी ने बच्चों की तरफ़ देखा। पंडाल के बाहर उनकी मां भी खड़ी हुई थी। बच्चों को बुलाया नहीं उसने।
“भागो यहां से। गोपी इन लोगों को अंदर किसने घुसने दिया ? भगाओ इन्हे।”
दोस्त की पत्नी ने नौकर को डांट लगाई।
“मैम, सुबह से भगा रहा हूं। जाते ही नहीं हैं। कहते हैं इन्होंने इस घर को बनवाया है। यही रहते थे इस घर में। आपने इनका घर छीन लिया है और खाना भी नहीं खाने दे रहे हैं।”
दिनकर जी के मुंह से एक कौर भी नीचे नहीं उतरा।
“घर इनका कैसे हुआ मैं समझा नहीं।”
“सर, ये मजदूर के बच्चे हैं जो यहां काम करता था। गृहप्रवेश से पहले दिन तक यहीं थे। घर की सफ़ाई भी इन्होंने ही की है।”
गोपी ने दिनकर को समझाया।
“खाना तो खिला ही सकते हो इन्हें। बच्चे हैं, एक साल यहां रहे तो घर को अपना समझ बैठे हैं।”
दिनकर जी ने गोपी को समझाया। गोपी मालकिन की ओर देख रहा था।
“नहीं भाई साहेब, इन्हें सिर पर नहीं चढ़ाना है। जो बचेगा वो दे देंगे। आप खाइए और खाकर बताइए खाना कैसा बना है ?”
दिनकर जी उठ खड़े हुए और अपनी प्लेट उन दोनों बच्चों के हाथ में थमा दी। पत्नी ने भी उनका साथ दिया। अपनी प्लेट उन बच्चों की मां के हाथ में दे दी।
“अब हम चलते हैं। बहुत शानदार आयोजन किया आपने।”
चलते हुए दोनों ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
“लेकिन खाना तो खाकर जाइए।” दोस्त और उसकी पत्नी ने एक साथ कहा।
“घर से खाकर ही आए थे। हमारा खाना इन बच्चों और इनकी मां को खिला दीजिए। दुआ देंगे।”
दिनकर जी की पत्नी ने कहा। बच्चे खाना खाने में लगे थे।

***

लघुकथा-३
“भैया लौट आए ”
अंकिता चाहकर भी खुश नहीं रह पा रही थी। बात ही कुछ ऐसी थी। जिस भाई के लिए उसने अपनी गृहस्थी को भुला दिया था, मम्मी पापा के जाने के बाद जिसकी परवरिश उसकी प्राथमिकता बन गई थी आज उसने एक झटके में कह दिया था कि उसने विदेश में ही बसने का निर्णय ले लिया है और एक विदेशी लड़की से शादी कर ली है। दीवाली पर अंकिता संयम के फोन का इंतज़ार करती रही लेकिन कोई फोन नहीं आया। पूजा के बाद उसने फोन किया तो यही सूचना मिलती रही कि फोन नंबर बदल गया है। थक हार कर उसने बड़े भाई को फोन किया। उन्होंने बताया कि संयम ने एक विदेशी लड़की से शादी कर ली है और अब भारत वापिस नहीं आएगा। बड़े भाई से कई सालों से अंकिता की ज्यादा बातचीत नहीं होती थी। कोई काम होता तो संयम ही आता था। वह भी संयम को ही फोन करती थी। मम्मी पापा जब एक्सीडेंट में चल बसे तो संयम स्कूल में ही पढ़ रहा था। पढ़ाई में शुरू से ही अच्छा था। बड़े भाई चाहते थे कि बारहवीं करने के बाद संयम दुकान के काम में हाथ बंटाना शुरू करे लेकिन संयम पढ़ लिखकर नौकरी करना चाहता था। अंकिता शादीशुदा थी लेकिन फिर भी उसने संयम को सहारा दिया। उसकी पढ़ाई जारी रहे इसके लिए उसने खुद भी नौकरी की। एक साल पहले संयम छात्रवृत्ति पाकर विदेश पढ़ाई करने गया था। कोर्स पूरा होते ही उसे भारत वापिस लौटना था। अंकिता कब से सपना देख रही थी उसकी शादी का। नौकरी मिलते ही शादी करनी थी। लेकिन अब वह खुद से ही आंखें नहीं मिला पा रही थी।
भाई दूज के दिन हर बार की तरह उसने पूजा की। दोनों भाइयों की सलामती के लिए दुआएं मांगी। वह जानती थी कि अब कोई उसके घर नहीं आने वाला है। खाना खाने का मन नहीं हुआ। पुरानी फोटो देखने लगी जिसमें तीनों भाई बहन साथ खड़े थे। उसकी आंखें भर आईं। बड़े भाई की बात नहीं मानने का आज़ पछतावा हो रहा था। तभी सचिन का फोन आया ,” अंकिता मेरे साथ एक मेहमान भी घर आ रहा है। खाना तैयार रखना।” सचिन सुबह ही किसी मीटिंग के लिए निकल गए थे। उसने खुद को संभाला और खाना बनाने लगी। थोड़ी देर में सचिन घर आ गए। अंकिता रसोई में ही थी। ,” आज़ अपने भाई को टीका नहीं लगाओगी ?” सचिन ने पूछा तो अंकिता को गुस्सा आ गया। फिर भी संयत होकर बोली ,” सब जानते हुए भी क्यों पूछ रहे हो ?” सचिन अंकिता का हाथ पकड़ कर रसोई से बाहर ले आए। सामने बड़े भाई खड़े थे। अंकिता खुद को रोक नहीं पाई और रोने लगी। ,” अंकिता, मेरी समझदार बहन, रस्म पूरी करो।” सचिन पूजा की थाली हाथ में लेकर खड़े थे। अंकिता के लिए आज़ का दिन विशेष था। उसने अपने भाई को खोकर भी पा लिया था।

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लघुकथा-४
“कॉपीराइट”
मंत्री जी के बुलावे पर अपने सारे काम छोड़कर मैं भाग आया। उनके भाषण से इतना प्रभावित हो गया था कि उनके बुलावे के पीछे छुपा मकसद पहचान ही नहीं पाया। उनके आलीशान बंगले के आधुनिक बगीचे में बैठकर अपनी कमर ठोक रहा था कि आखिर मेरी नैया को पार लगाने वाला खिवैया मुझे मिल गया है।
कई सालों से होते आ रहे अपमान और दुर्व्यवहार के क्षण भी याद आ रहे थे। कितना मुश्किल होता है एक लेखक होना यह मेरे सिवा दूसरा कौन जान सकता था? पढ़ाई के साथ साथ ही लिखना शुरू कर दिया था। विद्यार्थी जीवन में काफ़ी प्रोत्साहन मिला जिससे हिम्मत बढ़ती गई और मेरा जुनून इतना बढ़ गया कि मैंने लेखन को ही व्यवसाय बनाने की ठान ली। मां बाप और शुभचिंतकों की एक नही सुनी बस लेखन में डूबा रहा। पापा रिटायर हुए तो घर चलाने के लिए पैसे की ज़रूरत पड़ने लगी किंतु पैसे आएं कहां से ? जो पत्र पत्रिकाएं लेखक को मानदेय भुगतान कर रहे थे उनसे पहचान नहीं थी और जो छाप रहे थे उनका मानदेय भुगतान का भविष्य में भी कोई इरादा नहीं था। आखिर अपनी रचनाओं को एकत्र करके शहर के नामी प्रकाशक के पास लेकर गया लेकिन जितनी रकम उन्होंने प्रकाशन की बताई वह तो एक साथ हाथ में भी नहीं ली थी। चुपचाप अपनी पांडुलिपि उठाई और घर वापिस आ गया। मां बाप अब लगभग चुप हो गए थे। अच्छा बुरा कुछ भी नहीं कहते थे। तभी एक समारोह के निमंत्रण पर गया तो वहां नेताजी को सुना। उन्होंने इतना सुंदर भाषण दिया कि सुनते ही मैं उनका मुरीद हो गया।
“कैसे हैं सक्षम जी ?” नेताजी सामने खड़े होकर पूछ रहे थे। लेखक होने की यह बड़ी मुसीबत है कि एक बार खयालों में डूबे नहीं कि उसके बाद वापिस आना मुश्किल होता है। हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
“सर हम बहुत अच्छे हैं बस आपंकी थोड़ी मदद चाहते हैं।” मैंने जवाब दिया और साथ ही अपनी पूरी लेखन यात्रा उन्हे बता दी जिसमें न धन मिल रहा था और न ही सम्मान। जबकि समकालीन लेखक साहित्यकार बन चुके थे।
“अच्छा तो यह बात है। मुझे कुछ सुनने में आ गया था इसलिए इसका हल ख़ोज लिया हूं।” मंत्रीजी की इस बात ने मुझे जितना सुकून दिया वह लेखक होते हुए भी बता नहीं सकता हूं। लेकिन पूरी बात जाने बिना खुश नहीं होना चाहिए यह बात मुझे दूसरे ही पल महसूस हो गई।
“देखिए आप ऐसा कीजिए कि जितनी कीमत प्रकाशक आपकी किताब की बता रहा है, उतनी हमसे ले लीजिए और अपनी पांडुलिपि हमें बेच दीजिए। वो क्या है ना हमारी धर्मपत्नी को हिंदी साहित्य में बहुत रुचि है।”
मैं अब भी खुश ही हो रहा था कि मंत्रीजी की पत्नी मेरी रचनाओं को पढ़ेंगी तो हो सकता है कोई सम्मान भी हाथ आ जाए किंतु जब उन्होंने अपनी बात पूरी की तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन निकल चुकी थी।
“तुम्हारी किताब उनके नाम से छप जायेगी। अच्छा लिखते हो तो उन्हे सरकार से कोई सम्मान भी मिल जायेगा। जो पैसे तुम्हे मिलेंगे उनसे दूसरी किताब छपवा लेना।” मंत्री जी की बात पूरी होने से पहले ही मैं खड़ा हो चुका था।
“पांडुलिपि घर भूल आया हूं, सर। क्षमा करें।” वो रोकते रहे लेकिन मैं सीधा उस अखबार के दफ्तर में जाकर रुका जो कई महीनों से मुझसे कंटेंट प्रोवाइडर बनने के लिए संपर्क कर रहा था।
“जो भी तनख्वाह दोगे हम काम करेंगे। खाली लिखने से बात नहीं बनेगी उसका कॉपीराइट भी तो होना चाहिए ना। कॉपीराइट बनवाने में जो पैसे लगेंगे वो तो कमाना पड़ेगा ना।”
अखबार का संपादक हमारा मुंह देखे जा रहा था।

***

लघुकथा-५
“अन्तिम सफर”
उन्हें घूमने का बहुत शौंक था। रिश्तेदारियों में भी वह खूब आते जाते थे। किसी को शहर जाना हो या किसी दूसरी जगह कोई काम हो, उनके पास अा जाता था। वह तो जैसे अवसर की ताक में ही रहते। तुरंत कपड़े घर भिजवा देते धोने के लिए। घर वाले भी उनकी आदत भली भांति परिचित हो चुके थे। इसलिए ज्यादा रोक टोक नहीं नहीं लगाते थे। कई बार उनके छोटे पोते को गुस्सा अा जाता। कहता” दादू की उम्र अब घर बैठकर आराम करने की है। परन्तु उन्होंने तो पूरे गांव का ठेका उठा रखा है। कोई भी किसी काम को कहे, तुरंत साथ चल देते हैं।” वह मुस्कुरा देते। “उसे समझाते हुए कहते शेर होते हैं जो सफर में अपना जीवन बिताते हैं। घर पर तो कायर पड़े रहा रहते हैं। जो खतरों से डरते हैं। और फिर यह जीवन, यह सफर हमे एक ही बार मिला है। दोबारा नहीं मिलेगा।”
उनकी बात का उसके पास कोई जवाब नहीं होता। निरुत्तर होकर चुप हो जाता।
परन्तु बढ़ती उम्र के कारण अब उतना सक्रिय नहीं थे वो। कई दिनों से बुखार अा रहा था। शरीर कमजोर हो गया था। बिस्तर से उठ भी नहीं पा रहे थे। सहारा देकर ही खाने के लिए, शौच के लिए उठ पाते थे। आंखों की रोशनी भी धीरे धीरे कम हो रही थी। सुनने भी कम लगे थे। इस हालत में भी बाहर से आने वाले और जाने वाले को बड़ी उत्सुकता से निहारते। जानने की कोशिश करते कि कहां से आया या गया। आंखों से साफ झलकता कि उसके साथ उनकी भी जाने की इच्छा हो रही है। एक दिन बोलने की शक्ति भी क्षीण हो गई। कुछ कहने की कोशिश करते लेकिन जीभ नहीं उठ पाती। जबान लड़खड़ा जाती। फिर इशारों में अपनी बात समझाने की कोशिश करते।
आज उनकी तबियत कुछ बेहतर लग रही थी। बार बार अंगुली से कुछ इशारा कर रहे थे। पोता पास आया तो उसे अपने कपड़ों को दिखाया। मानो कह रहे हों इन्हें धुलवा दो मुझे सफर करना है। उसने उनकी बात साझकर एक और जोड़ी कपड़े लाकर उनके पास रख दिए। कपड़ों को हाथ से अच्छी तरह टटोला उन्होंने। जैसे देखना चाह रहे हों कि साफ धुले हैं या नहीं। फिर तकिये के नीचे रख लिए। पोते को इशारे से पास बुलाया। इस बार इशारा लाठी के लिए था। उसने लाठी लाकर उनकी चारपाई से टिकाकर रख दी। अब उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे। दो दिन तक इसी हालत में पड़े रहे। कभी अपने जूतों को देखते, कभी रास्ते को निहारते। उठकर चलने की हिम्मत नहीं थी। तीसरे दिन तबीयत फिर बिगड़ गई। सभी घरवाले उनकी चारपाई के पास घिर आए। उन्होंने मुस्कुराने की चेष्टा की। बारी बारी से सबकी और देखा। फिर छोटे पोते को बुलाकर कपड़े अपने सीने पर रखे। लाठी को हाथ से पकड़ने की कोशिश की। पोते ने उनके सिरहाने बैठकर अपनी गोद में उनका सिर रख लिया। अब उनकी नज़र जूतों पर थी। कुछ देर बाद रास्ते को निहारने लगे।
घर वाले सोचते रहे, किसी के आने का इंतजार कर रहे हैं। परन्तु नब्ज टटोली तो सब खत्म हो चुका था। उनकी आंखों में वही स्थिर भाव था। जैसे कह रहे हों मै लंबे सफर पर जा रहा हूं अब। यह अंतिम सफर है मेरा।


पाँच लघुकथा

चितरंजन गोप लुकाटी

लघुकथा-१
अकाल जन्म

“अरे, यह कहानी सुनने-सुनाने का समय है क्या?”
“हां दादा जी, सुबह का समय शुभ होता है। सुनाइए न !”
बच्चों की जिद को दादाजी नकार न सके। महाभारत की कहानी सुनाने लगे। कद्रु और विनता की कहानी।
कद्रु के सारे अंडों से बच्चे निकल आए थे। परंतु उसकी सौत विनता के दोनों अंडे ज्यों-के-त्यों पड़े थे। ईर्ष्या की चिंगारी भड़क उठी। वह ज्योतिषी के पास गई और शुभ दिन देखकर एक अंडा फोड़ डाला।
“मां, मां, तूने यह क्या किया?” चिल्लाता हुआ बच्चा अंडे से बाहर निकल आया। वह ठंड से कांप रहा था।
“मां, मैं दुनिया का सबसे बड़ा शक्तिमान होता। पर हाय ! तेरी वजह से अधूरा रह गया ! मां, मुझे ठंड बर्दाश्त नहीं हो रही है। मैं जा रहा हूं।” और वह उड़ता हुआ सूर्य देवता के पास चला गया। उनके आगे बैठ गया और उनका सारथी बन गया।
“आगे क्या हुआ दादा जी?”
जाते-जाते वह बच्चा एक बात कह गया। “मां, दूसरे अंडे को मत…”
फट से दादा जी के माथे पर अखबार पड़ा।उनकी कहानी छिन्न-भिन्न हो गई।
“दादाजी, दूसरे अंडे का क्या हुआ?”
“अभी नहीं, बाद में।”
“बाद में कब?”
“कहानी सुनाने के उचित समय पर।” कहते हुए दादाजी ने अखबार उठा लिया। अखबार के मुखपृष्ठ पर मुख्य समाचार था– 11.11.11 के शुभ काल में बहुत सी माताओं ने अकाल जन्म दिया अपने बच्चों को। ऑपरेशन के द्वारा जन्मे ये बच्चे।

***

लघुकथा-२
परिवार के सदस्य

‘विकास’ सबसे पहले खड़ा हो गया। कॉपी देते हुए बोला– सर लिख लिया।

“वाह !” कहते हुए मैंने कॉपी देखी। उसमें उसका और उसके मां-बाप का नाम लिखा था। पूछा, “तीन ही नाम…? तुम्हारी दो बहनें भी हैं न?”

“हैं तो। पर वे हमारे परिवार की कैसे होंगी? शादी के बाद, दूसरे परिवार में चली जाएंगी न !”

“ओह, हां।” कहते हुए मैंने दूसरे बच्चे की कॉपी ली। एक-एक कर सबकी कॉपियां देखीं। क्लास टू के सभी बच्चों ने अपने-अपने परिवार के सदस्यों का नाम लगभग ठीक-ठाक लिख लिया था।

सबसे अंत में प्रकृति आयी। उसकी कॉपी में कुल पच्चीस नाम थे। उसके चार चाचा, चार चाचियां और उनके बाल-बच्चों के अलावा भी कुछ और नाम थे। एक नाम के नीचे उंगली रखकर मैंने पूछा– यह किसका नाम है?
“जी, हमारी बूढ़ी गाय का।” उसने जवाब दिया।
“और यह?”
“हमारे घर में एक बूढ़ा कुत्ता भी है न, उसका।”
“हूं… और यह?”
“सर, हमारे घर में एक पूंछ कटा तोता है। कहीं से खुद आ गया है।”
“अच्छा। और यह कौन है?”
“इ तो प्यारू है सर। हमारे आंगन में एक कुबड़ा पेड़ है न, पलाश का…? वही।”
मैं मौन था। मेरी दृष्टि प्रकृति पर टिकी थी और उंगली कॉपी पर।

***

लघुकथा-३
हजार साल बाद

“बेटा भागीरथ ! आ गया बेटा?”
“यस मम्म ! सारा कचड़ा गड्ढे में डाल दिया।”
“ओके बेटा।”
मम्म काम में व्यस्त थीं। भगीरथ उनके पास गया।
“मम्म, एक बात पूछनी है।”
“कौन-सी बात बेटा?”
“मम्म, ये लंबे-लंबे गड्ढे… भगवान ने इतने लंबे-लंबे कूड़ेदान क्यों बनाए हैं? नानी के गांव में भी है।”
“नहीं बेटा, ये कूड़ेदान नहीं हैं। एक समय इन लंबे-लंबे गड्ढों में पानी बहता था।”
“पानी?” भगीरथ चौंक उठा।
“हां, और इनका कोई छोटा-सा नाम भी था… दो अक्षरों का। अभी मुझे याद नहीं आ रहा है। रात को मैं इन गड्ढों के बारे में तुम्हें कहानी सुनाऊंगी।शायद तब तक मुझे नाम भी याद आ जाए।”
“ओके मम्म !” कहते हुए भगीरथ हाथ-पैर धोने के लिए बाथरूम में चला गया। उसने नल खोला और मम्म को आवाज दी, “मम्म नल से पानी नहीं गिर रहा है।”
“पानी का कार्ड खत्म हो गया है बेटा। तुम्हारे डैड रिचार्ज कराने गए हैं।” मम्म ने बाहर से आवाज दी।
रात हुई भगीरथ कहानी सुनना चाहता था। मम्म को उन गड्ढों का नाम भी याद आ गया था। वह प्रेम से अपने बेटे को कहानी सुनाने लगीं– बेटा भगीरथ ! एक थी ‘नदी’। उसका नाम था…।

***

ळगुकथा-४
ऐडमिशन

खिड़की पर एक लड़का हुलुक-बुलुक कर रहा था। गुरुजी ने आवाज दी, “कौन झांक रहा है?” इतना सुनते ही दो उद्दंड टाइप के लड़के दौड़कर क्लास से बाहर निकले और खदेड़ते हुए उस लड़के को पकड़ लाये।
“खिड़की से क्यों झांक रहा था?” गुरुजी ने पूछा।लड़के ने कांपते हुए जवाब दिया, “गुरुजी देख रहा था कि बच्चे कैसे पढ़ते हैं?”
“क्या तुम भी पढ़ना चाहते हो?”
“हूंं…।” लड़के ने माथा हिलाकर हामी भरी।
“क्या नाम है तुम्हारा?”
“गोरू।”
सभी लड़के हंस पड़े।
गुरुजी ने आगे पूछा, “पिताजी का नाम?”
“भालुक।”
फिर हंसी हुई।

अगले दिन गुरुजी भालुक के घर गए।भालुक ने कहा, “गुरुजी हमलोग पढ़-लिखकर क्या करेंगे?”
गुरुजी ने कहा, “मानुष बनोगे।”
यह सुनकर भालुक हा करके ताकने लगा। बोला, “मैं और मेरा बड़ा बेटा शेरू मजदूरी करते हैं। भेड़ू और उसकी मां बाबू के यहां काम करते हैं। और गोरू गांव की भेड़-बकरी चराता है। गोरू पढ़ने जाएगा तो…।”
गुरुजी ने काफी समझाया। उनके कामों का बंटवारा किया। तब भालुक गोरू को स्कूल भेजने के लिए राजी हो गया।
दूसरे दिन भालुक गोरू को लेकर स्कूल पहुंचा। गुरुजी ने गोरू को स्कूल ड्रेस, किताब, कॉपी और पेंसिल दी। गोरू बच्चों के बीच बैठकर पढ़ने लगा। गुरुजी ने ऐडमिशन रजिस्टर पर उसका नाम लिखा– गोरेलाल। अंगूठे का ठप्पा लगाते हुए भालुक की आंखों से आंसू छलकने लगे। छलछलायी आंखों से वह अपने बेटे को एकटक निहारने लगा। पर उसका बेटा इन सब से बेखबर, मानुष बनने की तैयारी में जुट गया था– क ख ग घ ङ। क ख ग ……

***

लघुकथा-५
सरस्वती पूजा

बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे। बारह बजे तक भूखा रहना कोई मामूली बात तो नहीं। उधर पंडितजी का कोई अता-पता नहीं था।किसी दूसरे पंडितजी को पकड़ लाने के लिए महादेव इधर-उधर घूम-घामकर वापस आ चुका था। आज के दिन तो हरेक पंडित दस-दस बारह-बारह मूर्तियों की पूजा का ठेका पहले से लिए रखते हैं।
सभी लोग परेशान थे। अब क्या होगा? पूजा कैसे होगी?
मैंने कहा, “एक बात कहूं?”
“हां, कहिए न सर।” सबने स्वीकृति दी।
“महादेव, तुम तो स्कूल का सबसे होशियार लड़का हो। पूजा तुम करो।”
यह सुनकर सब चुप हो गए। लड़खड़ाती आवाज में महादेव ने कहा, “म-म-मैं? मैं तो आदिवासी…?”
“उससे क्या? आज के लिए पंडित बन जाओ।”
“पर मुझे तो मंत्र-तंत्र कुछ नहीं आता।”
“मंत्र नहीं आता, मन तो है न तुम्हारे पास। अपने मन से मां का आह्वान और पूजा करो। अपनी भाषा में मन की बात बोलो। बस।”
महादेव मूर्ति के नजदीक बैठ गया। उसके पीछे सारे छोटे-छोटे बच्चे बैठ गए। उसने धूप-दीप जलाया और पूजा शुरू हो गई–
‘जोहार गो सरस्वती !
आले मंत्र-तंत्ररा कथा वाले बुझ एदा…
ओनाते आलेरेन गो आ कथारे…
मनेरेणक कथारे, अंतर मनेते…
देवा सेवा एह ले…
आतांग में !
ऐ गो, आतांग में !!

( नमो माता सरस्वती। हम मंत्र-तंत्र की भाषा नहीं समझते। इसलिए अपनी मां की भाषा में… हृदय की भाषा में…हृदय से तुम्हारी पूजा कर रहे हैं। स्वीकार करना… हे मां, स्वीकार करना ! )


पाँच लघुकथा

अर्चना कोचर

लघुकथा-१
अर्धविक्षिप्त
“मुबारक हो, बेटी हुई है।”
नर्स की चहकती आवाज, बाप-दादा को ऐसी चुभी जैसे उनके कानों में किसी ने गरम-गरम सीसा उड़ेल दिया हो।
सविता अभी लेबर रूम से बाहर नहीं आई थी। बाप ने नर्स के हाथों से मासूम को चील की तरह झपटा। दादा ने बिना एक पल गंवाए उसका गला दबा दिया –
“जा बेटी, जहाॅं से आई है, वहीं जा। इस जहान में तेरी कोई जगह नहीं, अगली बार भैया लेकर आना।”
सविता के ऑंसू अजीत ने रो-धोकर बड़े प्यार से पोंछे – “ घर की लक्ष्मी थी…लेकिन मरी हुई पैदा हुई थी। तुम्हें उसके अंतिम दर्शन कराकर, मैं तुम्हारी पीड़ा और नहीं बढ़ाना चाहता था।”
कुछ ही महीने बाद घर में दोबारा उम्मीदें पनपने लगीं।इस बार घर जुड़वा बच्चों की किलकारियों से गुलजार होने वाला हैं, यह सुनकर घर में खुशी की लहर दौड़ गई। शक की कोई गुंजाइश न रहें, इसलिएसविता का खास ध्यान रखा गया।
फिर से वहीं नर्स की चहकती आवाज – “मुबारक हो, बेटा-बेटी हुए हैं ।”
बाप-दादा बेटे को गोद में खिलाने को लालायित हो उठे, लेकिन नर्स ने बेटी को थमाते हुए – “बेटा असमान्य है, उसके ठीक होने की उम्मीद कम है, अभी वह डॉक्टरों की निगरानी में है‌।”
दादा ने जैसे ही बेटी का गला दबाने की कोशिश की, लड़की ने जोर-जोर से रोकर पूरा अस्पताल सिर पर उठा लिया।
आपने ही तो कहा था – “अगली बार भैया लेकर आना। अब मेरी बड़ी बहन वहाॅं अर्धविक्षिप्त सी भटक रही थी, मैं उसे भैया बना लाई हूॅं ।”
बाप-दादा दोनों सन्न…।

***

लगुकथा-२
दीन-हीन याचक
उस दीन-हीन याचक की बढ़ी हुई दाढ़ी-मूंछ, मैले-कुचेले कपड़े उसकी दरिद्रता की गवाही दे रहे थे । दो-ढाई साल की बच्ची को प्रैम में बैठाकर शहर की सबसे व्यस्ततम सड़क पर बने माल, शोरूम, रेस्टोरेंट और मिष्ठान भंडार पर खरीददारी एवं खाने का लुफ्त उठाने वाली भीड़ के आगे याचक मुद्रा में हाथ फैलाकर भीख मांग रहा था । लोग भी सड़क किनारे गाड़ी पार्क करके अपनी हैसियत एवं श्रद्धा के अनुसार नोट पकड़ा रहे थे। उनमें से एकाध खुद्दार उसे घुड़ककर – कमाकर खाने की नसीहत दे देता और दो-चार बिना दिए चुपके से बाईपास हो जाते। उन्हें वह कनखियों से ऐसे घूरता जैसे बख्शीश लेना उसका मौलिक अधिकार हो ।
वेद प्रकाश का साहित्यिक मन उसकी दयनीय स्थिति पर कुछ लिखने के लिए हिचकोले भरने लगा और वह गाड़ी में बैठे-बैठे ही उसकी फोटो खींचने लग गया । उसे देखकर भिखारी मंद-मंद मुस्कुराने लगा।
वेदप्रकाश ने भी कैमरे के एंगल को अलग-अलग पोज में घुमा दिया। जैसे ही उसने चलने के लिए गाड़ी को गति दी, भिखारी ने हाथ से खिड़की के शीशे पर ठक-ठक किया । जरा सा शीशा खुलते ही वह बोला, “आपने मेरी फोटो खींची है, मैंने आपकी गाड़ी का नंबर नोट कर लिया है । कुछ किया तो खैर. ..।”
भयभीत वेद प्रकाश ने पूरा वाक्य सुने बिना ही गाड़ी की गति को रफ्तार दे दिया । उस दिन से वेदप्रकाश और कलम दोनों सदमे में हैं। गाड़ी की नंबर प्लेट बदले या उसे बेच दे। बेफिक्र भिखारी अभी भी मजे से वहीं पर अपनी दयनीय स्थिति को भुना रहा है।

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लघुकथा-३
लकी
उसके पैदा होने पर पंडित द्वारा उसका नामकरण व अक्षर पर विवेक किया गया, लेकिन परिवार के अनुसार इसका पदार्पण हमारे घर में काफी भाग्यशाली रहा है । क्योंकि उसके पैदा होते ही दादाजी बरसों पुराना जमीन का केस जीत गए, बुआ का रिश्ता पक्का हो गया तथा उसके रोने की आवाज के साथ ही बाबूजी के हाथ में सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र था।
मां-बाबूजी ने वात्सल्य से उसे निहारा और पंडित-पुरोधा बनकर उसकी भाग्य कुंडली को लकी नाम देकर लकी कर दिया । नाम के अनुरूप उस पर लक की देवी मेहरबान रही और संघर्ष के बिना उसे हर वो चीज मिली जिसकी आम आदमी आकांक्षा करता है। पद-प्रतिष्ठा, धन-दौलत, अच्छी पत्नी, बेटा-बेटी सब।
लेकिन सड़क की हैवानियत में लहूलुहान पड़ा था लकी का लकी चार्म – बेटी के छम-छम बजते कंगन और पैजानियों के घुंघरू, बेटे के कमर में बंधी नजरिया, पत्नी के मनमोहक मुस्कान वाला परिवार के प्रति अर्पण-समर्पण और मां-बाप का तप-त्याग और उसे विवेक से लकी बनाने का सफर ।
लोगों का हजूम लकी-लकी पुकार रहा था, लेकिन बदहवास लकी पागलों की तरह शमशान घाट में राम नाम सत्य के प्रवाह में धूं-धू कर एक साथ जल रही इन पांचों चिताओं के धुंए में अपने लक का धुआं उड़ते हुए देख रहा था।

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लघुकथा-४
लिव इन रिलेशनशिप
“जिंदगी तुम बड़ी दल-बदलू हो।”
जिंदगी के अंतर्मन में खलबली मच गई और पूछने लगी, “कैसे।”
नीना, “बस, वैसे ही बोल दिया।”
इतना बोलकर नीना की जिंदगी में खलबली मचाता अंतर्मन तो शांत हो गया, लेकिन नमित की जिंदगी में खलबली मचा गया।
आज नीना, कल रीना, परसों करीना, फिर और-और…। यह सब रिश्ते जहाॅं शादी के पावन बंधन पर कुठाराघात है, वहीं आधुनिकता के नाम पर लिव इन रिलेशनशिप में रहने वालों के स्वाभिमान पर भी गहरी चोट था।
लड़कियों के मामले में नमित की रोज-रोज की इधर-उधर फिसलती नस नीना को हर हाल में असहनीय थी ।
नीना, “नमित हम चाहे रिश्तों के बंधन को किसी भी रूप में अंजाम दें, वह रिश्ता विश्वास और ईमानदारी तो चाहता ही है।”
समझाने पर नमित का एक ही नपा-तुला जवाब होता,” क्या नीना इतनी एडवांस होकर ऐसी दकियानूसी सोच रखती हो। लिव इन रिलेशनशिप में रहने का यहीं तो फायदा है, पुरातनपंथी शादी के बंधनों और रस्मों रिवाजों से आजाद, फिर ठहाका लगाते हुए अर्थात् आजाद पंछी ।”
नीना,” नमित, लिव इन में रहते हैं, बाजारू नहीं है । इतने भी एडवांस नहीं हुए जो कपड़े की तरह मर्द-औरत बदले ‌।”
यह कहते हुए उस उन्मुक्त परिंदे को सारे बंधनों से आजाद करके वह अपनी राह मुड़ गई और वह उन्मुक्त परिंदा स्वयं को परकटा महसूस करके फड़फड़ा रहा था।

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लघुकथा-५
विडंबना
विवेक साहब ने सर्वेंट क्वार्टर का सारा सामान वृद्धा आश्रम में दान करने का निर्णय लिया था। सामान पैक करते हुए रघु और मनीष, विवेक साहब की दरियादिली के गुण गाते नहीं थक रहे थे‌। गैर होते हुए भी विवेक साहब ने रुक्मणी अम्मा और लक्ष्मण बाबा का अंतिम संस्कार एवं सारे कर्मकांड बिल्कुल सगे बेटे की तरह निभाकर पूरे शहर में मिसाल बने हुए है। उनके जीते-जी भी वह उनकी दवा-दारू और रहन-सहन का कितना ध्यान रखते थे। रहते तो वह भले ही सर्वेंट क्वार्टर में थे, लेकिन उन्हें बराबर मान-सम्मान देते थे।
अम्मा-बाबा जब इस क्वार्टर में रहने आए थे, साहब ने अपना सारा कीमती सामान उन्हें भेंट कर दिया था और खुद नया खरीद लिया। साहब और मेमसाब दो-चार बार प्रयोग करने के पश्चात अक्सर अपने कपड़े भी अम्मा-बाबा को दे दिया करते थे।
अम्मा और बाबा का आपस में कितना प्यार था। एक-दूसरे के बिना बिल्कुल नहीं रहते थे। पन्द्रह दिन के भीतर-भीतर दोनों पति-पत्नी स्वर्ग सिधार गए ।
इसी दौरान पेटी में सुनहरी फ्रेम में सजी, रेशमी कपड़े में लपेटकर रखी, अम्मा-बाबा के परिवार की तस्वीर रघु और मनीष के कौतूहल का विषय बनी हुई थी‌।
रघु, “रुक्मणी अम्मा और लक्ष्मण बाबा कितने खूबसूरत और जवान दिख रहे है।”
मनीष, हाॅं-में-हाॅं मिलाते हुए, “साथ बैठी दोनों लड़कियां तो राधिका और अनामिका दीदी हैं लेकिन तस्वीर वाले मुन्ना की शक्ल हू-ब-हू विवेक साहब के बेटे ईशान से मिलती है। शक्ल सूरत में ईशान बाबा बिल्कुल विवेक साहब पर गए हैं।”
तस्वीर मानो बहुत बड़े राज से पर्दा हटा रही थी । रघु और मनीष के मन में साहब की दरियादिली वाली छवि कुछ धुंधलाती जा रही थी।

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