अपनी बात/ लेखनी-मार्च-अप्रैल 18

भरी झोली भी क्यों खाली-सी ही लगती है, तुझसे कितना भी मिल लूँ, जी क्यों नहीं भरता…कुछ ऐसा ही तो है यह लगाव, यह रागरंग ! हमारी यह सृजन यात्रा यूँ ही अनवरत चलती रहे…हमें आपको ऐसे ही लुभाती रहे लेखनी, सदा बस यही एक कामना ही तो रहती है मन में। लेखनी इस अंक के साथ अपनी सृजन यात्रा के बारहवें वर्ष में प्रवेश कर रही है और जिन-जिन कवि, लेखक व समालोचक मित्रों ने इस लगन-यज्ञ में समिधा बनकर साथ निभाया है, उनके हम तहेदिल से आभारी है। उम्मीद है आप सभी के सहयोग से यह लौ आगे भी ऐसे ही प्रज्वलित रहेगी।

लेखनी का पहला प्यार शायद भारत ही रहा है, तभी तो वहीं जाकर रम जाती है;कहीं भी कितना भी घूम और रच लें बिना भारत की धरती के, वहाँ के हालचाल लिए मानो सब अधूरा-सा ही रह जाता है। सौभाग्य ही था कि इस बार पिछले चार महीनों में जल्दी-जल्दी से दो बार भारत जाने के अवसर मिले और एक पर्यटक की तरह भी घूमें वहाँ…गोवा, मुंबई, भुवनेश्वर, कोणार्क और जगन्नाथ पुरी…फहरिस्त विविध और रोचक है। पांचाल प्रदेश फरुक्खाबाद में इसबार दुर्वासा ऋषि का आश्रम देखा जो अब एक सफल गोशाला भी है। बनारस में नौका बिहार करते समय रात के अंधेरे में काशी को गोदी में समेटे गंगा मां के दर्शन का एकबार फिर सौभाग्य मिला और एक बार फिर मन में वही भावों का आलोड़न था । एक तऱफ जहाँ घाट की रंग-बिरंगी रोशनी की परछाँइयाँ मन में अभूतपूर्व शांति और उल्लास भर रही थीं, वहीं दूसरी तरफ जलती चिताओं की लपटें उदास विरक्ति…वही कौन था…कैसा था…तरह तरह के सवाल और जवाब और वही असह्य गंध।
कई मंदिर भी देखे- पुरी का, लिंगराज का। परन्तु पुरी के पास रघुराजपुर गांव में घूमना अपने आप में एक अभूतपूर्व अनुभव रहा। कागज और सिल्क पर पेन्टिंग के अलावा स्थानीय कलाकार ताड़ के पत्तों पर अपनी लेखुनी से अद्भुत आकृतियाँ उकेर रहै थे और फिर उन्हें काली स्याही में भरकर खूबसूरत कलाकृतियों का रूप दे दिया जाता था। हमने भी उनकी लेखुनी से ताड़ के एक पत्ते पर अपना हाथ अजमाया और फिर जब उसने एक कलाकार की तरह हमारा अभिनंदन किया और हमें एक तस्बीर तुरंत ही कागज पर खींचकर सौगात में दी तो हमारा मन भी एक बार तो बच्चे-सा ही किलक उठा था। हमने भी तुरंत ही वह लेखुनी और एक पेन्टिंग व कुछ छोटी मोटी दूसरी कलाकृतियाँ खरीदकर अपनी कृतज्ञता जताई और धरोहर की तरह उन्हें समेटकर बेहद पुलकित मन से उन समर्पित कलाकारों से विदा ली। कोणार्क जाना तो मानो हमारा एक सपना ही था जाने कितने वर्य़ों से। वहाँ जाकर जो खुशी हुई वह अपने आप में एक उपलब्धि जैसी ही लगी। कोणार्क और पुरी के बीच स्थित ऱेत की आकृतियों का वह संग्रहालय भी शायद ही कभी भूल पाऊँ, अद्भुत कलाकृतियाँ थीं वह भी पत्थर या काष्ठ पर नहीं, भुरभुरी रेत पर बनी।
पुरी में सागर किनारे वह मोती बेचने वाला भी भुलाए नहीं भूलता , जिसने तीन दिन तक रोज इंतजार किया क्योंकि बुखार के रहते वहाँ आ नहीं पाई थी और उससे मैंने वादा किया था कि आऊंगी अवश्य, उसकी कुछ मालाएँ अवश्य ही लूंगी। फिर जब आई और बाद में अंधेरे में अकेली बैठी लहरों को देख रही थी तो दूर बैठा वह भी मेरी चौकीदारी करता रहा। फिर अंत में होटल के अंदर पहुंचाकर ही गया। ऐसा क्यों? सामने ही तो होटल था- पूछने पर बोला- दीदी आपको अकेला छोड़कर भला मैं कैसे जाता! अपरिचितों से इतना स्नेह और इतनी परवाह…मन अनजाने ही भीग-भीग गया। शायद दीदी शब्द का ही वह जादू था।
परिजनों और मित्रों से मिलने-जुलने के साथ-साथ भारत के विभिन्न प्रान्तों के भ्रमण के यह अविस्मरणीय पल थे । अजंता और एलोरा न जा पाने का दुख रहेगा क्योंकि एलिफेंटा गुफाओं ने प्यास और बढ़ा दी थी परन्तु तब भी दो तीन दिन अस्वस्थ होने की वजह से बेकार हो गए थे। चीन, मेक्सिको, जिबराल्टा और नेपाल के अवावा और भी कई जगह तरह तरह की गुफाएं, भित्ति चित्र और नैसर्गिक खनिज फौर्मेशन देखें हैं पर मन बचपन से ही अजंता एलोरा में ही अटका हुआ है। भगवान ने चाहा तो जल्द ही, वह भी…फिलहाल तो आश्चर्य नहीं कि बारहवें वर्ष के इस प्रवेशांक के लिए ‘भ्रमण’ विषय को ही क्यों चुना है हमने, आप भलीभांति समझ ही गए होंगे। भ्रमण जो एक आदत भी है और उपचार भी। संयम भी है और सबक भी। हर यात्रा के बाद सोचती हूँ -कितना कुछ है चारो तरफ सीखने को, समझने को…लेने और बांटने को ही नहीं, धरोहर की तरह संजोने को भी। ये यात्राएं ही तो सिखाती हैं कि पहले, बहुत पहले हम एक थे , हमारी शुरुवात शायद एक ही जगह और एक ही माँ-बाप से हुई थी। फिर इतनी असहिष्णुता क्यों …इतना शौर्य प्रदर्शन , लूटपाट , दूसरों के प्रति पूर्ण अवहेलना क्यों ? संक्षेप में कहूँ तो युद्ध और अराजकता क्यों ? भ्रमित हूँ सोचती थी लड़ाइयाँ हक के लिए होती थीं, अब देख रही हूँ कि ये आधिपत्य के लिए ही नहीं, व्यापारिक हितों के लिए भी होती हैं। क्या वक्त नहीं आ गया जब गंभीरता से निशस्त्रीकरण के बारे में सोचा जाए ताकि यह व्यर्थ का नर-संहार रुके । मासूम बच्चों का आल, शलगम की तरह झुलसना रुके। आपकी क्या राय है -क्या ये अत्याचार , यह हिंसा -कभी किसी बहाने तो कभी किसी बहाने यूँ ही चलती रहनी चाहिए या इसपर रोकथाम के लिए सभी को एक जागरूक विश्व-नागरिक की तरह सचेत और सक्रिय होना चाहिए? निशस्त्रीकरण की जरूरत या इच्छा- यही विषय है हमारे अगले अंक का। भांति-भांति की क्रूरता के खिलाफ संवेदना और जागरूकता से भरी आपकी जिम्मेदार रचनाओं का हमें इंतजार रहेगा। आप अपनी रचनाएं 15 मई तक हमें भेज सकते हैं ई. मेल द्नारा । पता है-shailagrawal@hotmail.com

लेखनी के इस अंक के साथ हम ताराचंद नादान जी का उनके गीत और ग़ज़लों के साथ लेखनी परिवार में स्वागत कर रहे हैं। और भी बहुत कुछ है आपके प्रिय और परिचित कवि लेखकों द्वारा जो आपको बांधे रहेगा। थोड़े विलंब से अवश्य परन्तु उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि यह पर्यटन अंक आपको पसंद आएगा और पृथ्वी पर बिखरे इन मनभावन जगहों को ( खुद अपने भारत में भी हजारों रत्न चारो तरफ बिखरे हुए हैं।) घूमने की प्रेरणा आपको भी मिलेगी। भ्रमण जो कि न सिर्फ बहुत कुछ सिखाता है हमें अपनी नवीनता और विविधता के कारण अपितु जीने की नव उर्जा और प्रेरणा भी देता है। बताता है कि कैसे दूसरे जीते हैं और उनसे क्या-क्या सीखा व अपनाया जा सकता है? पुष्टि करती हैं ये यात्राएं इस बात की भी कि यदि व्यक्तिगत स्वार्थ और ईर्षा-लालच आदि न टकराएँ ,या हम उन्हें दूर रख सकें तो सभी जाने-अनजाने मित्र ही तो हें सब…मुस्कुराते और सदा मदद करने को तत्पर, क्योंकि आदमी का मूलभूत स्वभाव आज भी सरल और दूसरों की मदद करने वाला ही है।…

पुनश्चः पता नहीं कौन थे वह, किसके रिश्तेदार थे और किस ताकत और सहारे के मदान्ध ऐसे सामूहिक पशुवत् कृत को अन्जाम दे पाए, वह भी एक आठ साल की अबोध के साथ…मन क्रोध और विष्तृणा से भर उठा है , अगर आसिफा के अपराधियों को सजा नहीं मिली तो भारत अपनी शुचिता और धर्म निरपेक्षता दोनों ही खो बैठेगा। पशु कितना ही ताकतवर क्यों न हो परन्तु यदि मदान्ध होकर नरभक्षी हो जाए तो भी क्या हमें उसे यूँ ही खुला घूमने देंगे…विषय सोचने ही नहीं , उचित निर्णय की…न्याय की मांग करता है और उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि देश के कर्णधार और न्यायाधीश उचित से उचित कार्यवाही करेंगे…बेटी बचाओ सिर्फ एक नारा ही नहीं रहेगा देश में। लोग कांपेंगे किसी भी बेटी के प्रति कलुषित नजर रखने से पहले।


शैल अग्रवाल