
नव वर्ष के संकल्प नव !
वक्र भले है पदचाप समय की
विधना भी चाहे खेले आँख-मिचौली
उदास नहीं, निराश नहीं, है विश्वास अटूट
जबतक ये सूरज चंदा उत्साह रहे, रहे हर्ष
ज्योति किरण सी रहे आस सदा जगमग
शब्ब् शब्द हर भाव स्वप्न-सा मनमोहक
जलती धरती पर ज्यों शीतल मरहम
आना ऐसे ही हरियाते-लहराते तुम
नव वर्ष के संकल्प नव !
देखते-देखते समय का वह बिन्दु एकबार फिर आ गया है जब पुराने की विदा और नए का स्वागत करने को उत्सुक तो हैं हम पर नहीं जानते कि आगे क्या है …कोयला या हीरा हमारी किस्मत में वक्त की इस अंधेरी खान से?
अच्छा या बुरा जैसा भी हो, न तो वक्त ही थमता है और ना हमारी अपेक्षा और अभिलाषाएँ ही जीवन से। जितना शतरूपा संसार, उतने ही इंद्रधनुषी सपने और इनसे उत्पन्न राग-वैराग व सुख दुख। 2025 तो वाकई में एक उथल- पुथल भरा और कठिन वर्ष था। कई बड़े नेताओं के अहम और वहम की लड़ाई से पूर्णतः घायल और परेशान। वर्ष २०२६ विश्व में शांति और सद्भावना लेकर आएगा अब तो बस यही प्रार्थना है।
मुश्किलों से भरे थे अक्तूबर, नवंबर और दिसंबर के तीन महीने मेरे लिए शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से ही । पीड़ा से क़रीब-करीब अपाहिज-सा करने वाले। और इतना सारा था सनेटने और सहेजने को कि काफी तुछ छूट गया। फिर भी सारी मुश्किलों के बावजूद आपकी लघुकथाओं से सजा यह दूसरा अंक भी अब आपके हाथों में है। इसे भी प्रभु का आशीर्वाद और आप सभी के स्नेह और सहयोग का ही परिणाम मानूंगी और अंतःस्थल से आभारी हूँ सभी सहयोगी लेखक मित्रों की और आप सभी उत्साही पाठकों की भी जो लगातार पढ़ रहे हैं और नए अंक को तैयार करने की उर्जा देते रहते हैं।
कुछ मित्रों को शिकायत रही कि वह पहले अंक में क्यों नहीं रखे गए। पक्षपात का भी आरोप लगाया गया परन्तु करीब १४०० लघुकथा में से हजार छांटना और २०० से अधिक रचनाकारों को एक ही अंक में दे पाना संभव ही नहीं था।
कहते हैं जहाँ चाह वहाँ राह काम पूरा हो ही गया और विश्वास है आपको पसंद भी आएगा। किसी भी कठिनाई और अंधेरे से निराश नहीं होना है हमें कभी। उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि आगामी वर्ष सुखद, शान्त और उम्मीदें लेकर आएगा। विश्व के लिए भी और हम सभी के लिए निजी तौर पर भी क्योंकि दुनिया अभी भी हरी-भरी और सुंदर है, तारों भरे आकाश से झिलमिल और सूरज चंदा से जगमग। तरह तरह के फूल और सुगंध हैं और हैं बच्चों की किलकारियाँ आज भी हमारे चारो तरफ।
पहले कभी जब राजाओं के सामंतशाही रवैयों से जनता त्रस्त हो गई थी तो सिंहासन पलट दिए गए थे और लोकतंत्र की स्थापना हुई थी, जहाँ अपने ही बीच से सुयोग्य और समर्पित चुनिंदा नेता चुने जाते थे जो बागडोर संभालते थे। पर अगर वही नेता एकदिन खुद को राजा समझ बैठेंं तो…? विवेक खो दें, सद्भाव खो दें और वही सामंतशाही रवैया अपना ले तो?
समस्या गंभीर है और कुछ ऐसे ही धमाके और उलझनों के साथ शुरुआत हुई है २०२६ की जहाँ दशा और दिशा दोनों ही अनिश्चित तो हैं ही आम आदमी भ्रमित और भयभीत है।
इनसान ईश्वर नहीं है और ना ही ईश्वर को ठीक से जानता और सनझता ही है, पर ईश्वर बनना अवश्य चाहता है। ताकत और रुतबा आते ही ईश्वर-ईश्वर खेलने अवश्य लग जाता है। ताण्डव और रासलीला सब एक याथ कर रहे हैं आज ताकतवर देशों के ताकतवर नेता। और असहाय जनता हाथ पर हाथ धरे अब ‘आगे क्या’ का इंतजार करती बेबस भुगत रही है सब कुछ।
ये सारे ज्ञान-विज्ञान और प्रयास, यह संयोजन और संरक्षण, नादान महत्वाकांक्षाएँ, उठा-पटक और लड़ाईृ-झगड़े पर किस लिए, विशेषतः तब जब पूरी मानवता ही विनाश के कगार पर लाकर खड़ी कर दी गई है? क्यों यह अमरत्व की तलाश, अमरत्व नहीं तो स्थायी निशान छोड़ने की चाह तक?
पर आदिकाल से ही तो रही है यह भी। और जकड़े रही है ताकत को न्याय को। दोनों ने ही तो पर अपनी आँखों पर पट्टी बांध रखी है…सह नहीं पाते, देख नहीं पाते यह जबर्दस्ती शायद इसलिए।
संरझक, सर्जक और अन्वेषक बनने की यह दौड़ माना नैसर्गिक स्वभाव है मानव का, कभी गुफाओं में चित्र उकेरे थे इसने तो कभी पेडों की छालों पर निशान छोडे थे इसने। पर जब सब मेरा दूसरे का या दूसरे के लिए कुछ भी नहीं तो खतरे की घंटी स्वाभाविक है। सद्बुद्धि और सद्भाव दे सभी को
अविष्कार हित और अहित दोनों में ही, इसी स्वार्थी उपक्रम के ही तो परिणाम हैं मानव द्वारा। अब तो धरती तक छोटी पड़ने लगी है इसके लिए और चांद और अन्य ग्रहों पर भी झंडे गाड आया है यह। जीवन और सभ्यता के कैप्सूल छोडे गए हैं आने वाली पीढ़ियों के लिए, जो इस धरती के पूर्ण दोहन के बाद अन्य ग्रहों पर जाकर रहेगी कभी इस आशा में। कम-से-कम सपना तो यही है हमारी इस प्रगति शील सदी के महत्वाकांक्षी मानव का! प्रयास और प्यास भी जारी है और रहेंगे भी, क्योंकि क्रिया के साथ प्रतिक्रिया और विकास दोनों ही नियम हैं प्रकृति के भी और मानव स्वभाव के भी।
कुरान बाइबल और गीता से लेकर एटम की खोज और विध्वंस के हथियार, आज की हिप हौप डिजिकल संस्कृति से लेकर, ड्रोन अटैक से लेकर शेयर बाजार तक की यह दास्तान वाकई में एक लम्बी कडी ही तो है हमारी अखंड जीवन श्रंखला की।
इसी ईर्षा, असंतोष और साथ-साथ तृप्ति और आल्हाद की अभ्व्यक्ति है हर कला भी पाषाण युग की भित्तिकला से लेकर आजकल के डिजिटल आर्ट और रील व ये लघुकथाएं भी।
एकबार फिर बड़े धैर्य और शिल्प के साथ हमारे लघुकथाकारों ने पिरोया है और हमने दो भागों में संजोया है इन्हें। उम्मीद है अंक और श्रम सार्थक रहा हमारा और आपकी पसंद के अनुरूप है। प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा हमें।
कला और कडे नियम दो विपरीत ध्रुव हैं हमारे हिसाब से। आप भी मूल्यांकन का काम बुद्धि पर नहीं मन पर छोड़ दें और जो पसंद आए बस उसका आनंद लें। डूबें, बहें और आनंद लें संयोजित विविध लघुकथा और इनके भाव और विचारों का…जीवन के सारे रूप मिलेंगे आपको इन कथाओं में ।
एकबार फिर कहना चाहूंगी कि समय का उत्सव है नववर्ष भी और साहित्य भी। साथ-साथ जीवन-डायरी में लेखे-जोखे का समय भी है यह।
उदासी और निराशा को पीछे छोड़, पुराने को विदा करने का और नए के स्वागत का समय है यह और इसी का उत्स मनाया है हमने इस अंक में।
समय जिसे हमने गढ़ा है या जो हमें गढ़ता है निरंतर। पुनः पुनः बनाता और मिटाता है। यह रहस्य उतना ही गहरा है जितना कि आदि पुरुष द्वारा आदिकाल की कल्पना और स्थापना। उसे आदि देव मानकर सिर झुकाना और पूजते जाना। अँधेरा अवश्य ही रहस्यमय और डराने वाला ही रहा होगा पाषाण युग के लिए या उससे भी पहले के अर्ध मानव के लिए। पर अंधेरे के बाद रौशनी और रात के बाद सुबह आती ही है और यह क्रम भी राहत देता होगा उसे। इसी ने शायद उसे इंतज़ार करना और सपने देखना व योजना बनाना , अपनी जरूरतों के हिसाब से शिकार करना और संचय करना सिखाया होगा। हम जिसे सभ्शयता संस्कृति और समाज के बीज डाले होंगे। डरना नहीं, हिम्मत नहीं हारना सिखलाया होगा। आदमी को आदमी बनाया होगा जो कि मरते दम तक ख़ुद को, अपने घर -परिवार और साथ-साथ अपना समाज और प्रकृति की बागडोर संभाले खड़ा है । यदि सँभाल नहीं पाता तो भी कम-से-कम अपने साम्राज्य का संचालक और ईश बने रहने की ख्वाइश तो रखता ही है।
अब तो हमने समझ और अविष्नकारों के नए-नए आयाम छू लिए हैं। और कल्पना फिर भी नित नई और अकल्पनीय पेंगे लेती है। अमरत्व के सपने देखती है। बात चाहे जीवन की हो या फिर स्वामित्व की।
नववर्प के आगमन के साथ-साथ नई उम्मीदें और नए सपने आकार ले रहे हैं और प्रार्थना करने को मन करता है, हर अच्छी और हितकारी ख्वाइश पर आमीन कहने को मन कर रहा है क्योंकि कितना भी घना अँधेरा हो, सुबह होती ही है। सभी के सपने पूर्ण हों, फलें-फूलें ,इसी कामना के साथ नए वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएँ मित्रों।
लेखनी आगामी अंक के साथ 19 वर्ष पूरे करके बीसवें वर्ष में प्रवेश कर रही है। और इसे एक विशेष रूप से मनाने का मन है । अविस्मरणीय रचनाएँ…रचनाएँ जो साथ रह जाती हैं, प्रेरणा देती हैं। इसमें आप अपनी और दूसरों की, जीवित या मृत , विख्यात या अपरिचित किसी की भी रचना भेज सकते हैं, बस रचना अविस्मरणीय हो , याद रह जाएँ पाठकों को। आप अपनी किसी प्रेरक किताब या प्रेरणा पुरुष, अपने आदर्श के बारे में भी लिख सकते हैं। कोई ऐसी घटना भी, जिसने आपके जीवन की दिशा बदल दी हो और आपको मनचाही मंजिल तक पहुँचाया हो। ऐसे संस्मरण जिन्हें याद करके आप पुलक उठते हैं।
तो मित्रों खंगालना शुरु कर दें। भेजने की अंतिम तिथि 15 फरवरी 2026 है। वैसे तो हमेशा ही शुभस्य शीघ्रम है।
मिलते हैं पहली मार्च को एक नए और प्रेरक व अविस्मरणीय अंक के साथ ।
हवाएं सर्द हैं और विश्व भर में अफवाहें तूफानी। आँधी और बर्फ के इस मौसम में अपना और अपनों का ख्याल रखिएगा…

सादर व सस्नेह,
शैल अग्रवाल
shailagrawal@hotmail.com
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