अपनी बातः ये कहानियाँ


‘ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे नाविक! धीरे-धीरे ।
जिस निर्जन में सागर लहरी, अम्बर के कानों में गहरी,
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो- तज कोलाहल की अवनी रे ।‘
एक लुभाती कहानी की ही तो बात कर रहे थे जब यह लिखा था जयशंकर प्रसाद ने और ‘ हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥‘ लिखा था महाकवि तुलसी दास ने।…जाने कबसे सुनते आए हैं हम इन्हें, तरसते हैं नयी-नयी कहानियों के लिए। ये बतकही और ये कहानियाँ एक अभिन्न हिस्सा हैं हमारे समाज का…कभी गाकर, तो कभी मंचन करके और बाद में लिखकर भी और अब टाइप करके या डिजिटल विधा में भी। आजकी यह फिल्में, ये टी.वी. सीरियल इसी प्यास की तृप्ति के साधन मात्र ही तो हैं। कभी मन बहलाने को तो कभी सुलझाने को या समझाने को, कहानियों की यह अजस्र धारा जाने कबसे बह रही है हमारे बीच। यथार्थ और कल्पना, समाज के दोनों ही किनारों बीच आज भी सब कुछ सींचती और सहलाती-सी।
अतीत ही नहीं, कभी-कभी तो भविष्य में भी झांकती-सी प्रतीत होती हैं कहानियाँ। नई-पुरानी कई कहानियाँ प्रमाण हैं इस कथ्य की। कहा जाता है कि जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि। यानी कि कल्पना सच के बहुत आगे तक देख सकती है, देख पाती है। अतीत और वर्तमान ही नहीं आगत की भी पकड़े रखती है यह ।
माना, कहानियाँ वो इंद्रधनुष हैं, जो सच के आकाश में कभी निकलता ही नहीं, पर कल्पना के वितान ओढ़े ये कहानियाँ किसी हद तक लेखक का एक निजी सच भी तो हैं ही ! कभी खुद अपने अनुभवों के आधार पर तो कभी आसपास जो घट रहा है उसपर गढ़ित। यही वजह है कि एक तरफ तो सुख देती हैं ये, अक्सर ही सचेत भी करती हैं, एक सीख भी देती हैं। कुछ सूक्ष्म और शाश्वत ऐसा जो हमारे लिए जरूरी था, धरोहर था मानव समाज के लिए और जिसकी तरफ हमारा ध्यान नहीं जा रहा था, बचाए रखती हैं ये कहानियाँ। वक्त का दस्तावेज तो हैं हीं, अंतर्मन की प्यास भी हैं ये कहानियाँ।
आँखें बन्द किए ही जो हमें अपनी सतरंगी आभा में नहला दें, वे कहानियाँ लिखी नहीं जातीं, लिखवाती है खुद को। कोई धटना, कोई अनुभव जब कांटे सा जा धंसता है या रातरानी की महक-सा पीछा करता है, तो कागज पर उतरकर ही तो दम लेता है। सभी रचनाकार मित्रों को पुनः पुनः बधाई और आभार के साथ लेखनी के इस अंक को भी हमने कुछ जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों पर आधारित तो कुछ पूरी तरह से कल्पना की उड़ान लिए कहानियों के सतरंगी इंद्रधनुष से संजोने का प्रयास किया है। उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि आपको भी छुंएगे इनके ये बहुआयामी और सशक्त रंग।
वर्ष का अंत है यह। और त्योहारों का मौसम भी, जब अंधेरे को हटाने के लिए पूरा विश्व ही किसी न किसी त्योहार के बहाने दिए और कैंडल जलाएगा, ताकि रौशनी की उम्मीद जिंदा रहे, हिम्मत ना टूटे। वैसे भी एक बेहद कठिन वक्त से गुजर रहा है विश्व , उम्मीद है कुछ पल के लिए तो एक भुलावे में ले ही जाएंगी ये कहानियाँ आपको और अंक की अन्य दीपावली व क्रिसमस की सामग्री, थोड़ा बहुत ही सही, अंधेरों को भी तोड़ेगी। अंक कैसा लगा , बताना न भूलिएगा। इस अंक के साथ चार नए सशक्त कहानीकार जुड़ रहे हैं अपनी रोचक व छाप छोड़ती कहानियों के साथ लेखनी से। डॉ. अचला शर्मा जी, डॉ. रमाकांत मिश्र जी,डॉ. रंजना जयसवाल, और डॉ. जया आनंद जी, तहे दिल से स्वागत है आप का लेखनी परिवार में।
करोना काल का अंत अभी भी नहीं दिख रहा । वैक्सीन का अभी भी इंतजार है विश्व को। माना मिल भी जाए तो भी क्या अब इसका समाज से पूर्णतः निर्मूलन संभव है? क्या सीखा हमने करोना से और अब आगे क्या- लेखनी का जनवरी-फरवरी 2021 विशेषांक इसी जरूरी और ज्वलंत मुद्दे पर रखने का मन बनाया है हमने । कितना बदला आपका जीवन…भविष्य में क्या परिवर्तन देख पा रहे हैं आप अपनी सोच और व्यवहार में? आपके अनुभव , विचार, कविता कहानी और लेख आदि का हमें इन्तजार रहेगा। भेजने की अंतिम तिथि 20 दिसंबर और पता email: shailagrawal@hotmail.com
ज्ञान, विवेक और सद्भाव की रौशनी अंधेरे-से-अँधेरे वक्त में भी आपका पथ आलोकित रखे- सपरिवार स्वस्थ व प्रसन्न रहें। दिवाली, हनूका और क्रिसमस सभी त्योहारों की बहुत बहुत शुभकामनाएँ, मित्रों।


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