
एकबार फिर पहली मई आ गई है और ध्यान मजदूर आंदोलन और कम्यूनिज्म या लाल सलाम जैसे कई विभिन्न विषयों पर चला ही जाता है। बालमजदूरों की संख्या कम नहीं हुई क्योंकि भुखमरी और अत्याचार नहीं रुक रहे, युद्ध नहीं रुक रहे। परिवार टूट रहे हैं और मंहगाई के दैत्य से बचपाना आम परिवारों के लिए मुश्किल से मुश्किलतर होता जा रहा है । और अब तो बड़े-से बड़े कम्यूनिस्ट देश भी तेजी से पूंजिवाद की तरफ ही बढ़ रहे हैं और चारो तरफ ही आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ करने की ही होड़ लगी हुई है। मानवता, सहिष्णुता जैसे मुद्दों के लिए किसी के पास वक्त ही नहीं। ऐसे में मई दिवस का उत्सव मनाना एक अर्थहीन आंदोलन ही अधिक महसूस होता है। हाँ यदि हम इसे श्रम-दिवस कहें और श्रम की महत्ता का उत्सव मनाएँ, श्रम के महत्व और गरिमा को मिटने न दें तो यह आंदोलन निश्टय ही एक समकालीन और सार्थक रूप ले सकता है। श्रम को मात्र गरीबों की जरूरत न ठहराकर , सभी का गौरव बना पाएँ तो निश्चय ही यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। स्वस्थ और कुंठाहीन समाज के निर्माण में सहायक भी।
२९ अप्रैल का दिन ब्रिटिश पार्लियामेंट में बीता, तो ध्यान सामंत शाही पर जाना भी स्वाभाविक ही था। यह बात दूसरी है कि संदर्भ राजनीति का नहीं, अपनों और अपनों के उत्सव का था। भाषा और साहित्य के सम्मान का था ब्रिटेन की वातायन संस्था द्वारा समायोजित वर्ष २५-२६ के सम्मानों के उपलक्ष में आयोजित उत्सव का था।
डोर मैन ने हिन्दी में नमस्ते की, तो अच्छा लगा। फिर हमने जब उसे नमस्ते का अर्थ बताया कि मैं तुम्हारे अंदर बसे ईश या श्रेष्ठ के आगे नतमस्तक हूँ, तो वह भी बहुत खुश हो गया।
खैर…हम बात कर रहे थे एक मई की, पर अब जब लाल सलाम करने वाले सभी देश भी पूंजिवादी ही होते जा रहे हैं, तो हम भी इस दिन के पुराने सारे इतिहास को दोहराकर क्या करेंगे, और भूलकर सब, पूरे विश्व में चल रहे लडाई-झगड़े, सभी कुछ भूलकर बच्चों के साथ मिलकर उनका ही उत्सव आयोजित किया है हमने लेखनी के इस बाल-विशेषांक में और उनका ही उत्सव मनाएँगे । उन्हें श्रम का महत्व समझाएँगे। और उनकी बातों का, कहानियों का, बचपन के भोलेपन और मिठास का ही संयोजन करने की कोशिश की भी है हमने इस अंक में।
शुरुआत करती हूँ अपनी ही एक कविता से,
‘पहले मुर्गी आई या अंडा
सोच का बुरा है यह फंदा
छोड़ो सोचो मत ज्यादा
यह तो बात वही है होली
मुन्नी सयानी हंसकर बोली
बैठे-बैठे रह जाओगे सोचते
बीज गिरा था पेड़ से पहले
या पेड़ उगा बीज से पहले!’
शैल अग्रवाल
कौन किसका जनक है, सृष्टि रचयिता है-बच्चा या फिर वयस्क?
बचपन में जहाँ एक तरफ सीखने की बढ़ने की चाह है, गुंजाइश है, उत्साह और उम्मीद है, तो दूसरी तरफ वयस्कों की दुनिया में अनुभवों से अर्जित सोच व समझ है…दूरदर्शिता है।
माना हर बच्चे में बड़ो की सभी संभावनाएँ रहती हैं और हर बड़ा अंततक मन में एक बच्चे को संभाले रहता है। और मृत्युपरान्त फिरसे बच्चा बनकर ही लौटता है दुनिया में (मान्यता तो यही है) और यह अभेद्य चक्र चलता ही रहता है, फिर भी बच्चे को बड़ा नहीं माना जा सकता, और अगर बड़ा बच्चे की तरह व्यवहार करने लग जाए, तो हास्यास्पद ही दिखगा। बुनियादी फर्क न होकर भी एक फर्क तो रहेगा ही दोनों में, जो जरूरी भी है वयस्क होती जिम्मेदारियों के लिए। इतने गंभीर न भी हों,तो भी यदि विकास रुका, चाहे वह शरीर का हो या बुद्धि का,आगे कुछ और विशेष जानने और सीखने को , उत्साहित और ललायित होने को रहता ही नहीं। और यह आसन्न मृत्यु का ही तो संकेत है।
फलतः जरूरी है कि अंदर किलकते, दौड़ते-भागते बच्चे को अंत तक जिंदा रखा जाए, ताकि सहजता और मासूमियत बनी रहे। उत्साह और आनंद बना रहे। बढ़ने और उपलब्धियों की गुंजाइश बनी रहे।
बच्चों की यह दुनिया मोहक है , रंगीन है और हजार उलझनें और प्रश्न लिए हुए भी…कई बार तो बड़े भी हत्प्रभ रह जाएँ, ऐसे जटिल प्रश्न लेकर आते हैं बच्चे। क्योंकि हर बच्चे के अंदर एक वयस्क सदा रहता है और बच्चा या बालमन तो कभी बड़ों को छोड़ता ही नहीं। जी हाँ, वयस्क होकर भी नहीं। जरा मौका मिला नहीं, कि सारे सपनों की पिटारी लेकर आँखों में खेलने बैठ जाता है यह हमारे मन के अंदर छुपा बच्चा और हम वापस बचपन की उड़ान लेने लग जाते हैं…वही रूठना-मनाना और कट्टी-मिल्ली जीवन भर ही तो चलती हैं बड़ों में भी। आगे दौड़ते को लंगड़ी मारकर गिराना वयस्क भी कब भूल पाते हैं और खिलौनों के सिपाही और कारों के साथ, या गुड़िया के साथ खेलते बच्चों में वयस्क पूर्णतः साकार हो उठता है अपने सभी गुण और अवगुणों के साथ, छोटी-सी ही उम्र में देखे और अनदेखे अनुभवों के साथ। आश्चर्य नहीं कि कई सवाल जैसे कि उपरोक्त मुर्गी और अंडे वाला प्रश्न भी ज्यों का त्यों , अनुत्तरित ही समझ में आता हैं आज भी और सोच को निष्कर्ष पर न ले जाकर गोल-गोल ही घुमाता है। सवाल यह चाहे कितना भी टेढ़ा हो, परन्तु एक बात तो निश्चित है कि न तो मुर्गी बिना अंडा ही संभव है और ना ही अंडे के बिना मुर्गी ही। दोनों ही एक दूसरे पर आश्रित हैं, एक दूसरे से और एक दूसरे में ही अस्तित्व है इनका , जैसे कि आदमी और उसके बच्चे का भी । आदमी नहीं तो बच्चा नहीं और बच्चा नहीं तो वयस्क भी नहीं। क्या फर्क पडता है पहले आदमी आया या फिर बच्चा, मुर्गी आई या फिर अंडा! हां, इतना अवश्वय कहा जाता है कि बृह्माजी ने सृष्टि रची थी और प्रकृति व पुरुष दोनों को ही एक दूसरे पर ऐसा आश्रित कर दिया था कि एक-दूसरे के बिना उनका काम ही न चले। बाइबल में भी ‘गौड क्रीएटेड अर्थ इन सेवेन डेज।’ और वर्ड्सवर्थ ने तो यहाँ तक कह दिया कि ‘चाइल्ड इज द फादर औफ द मैन’, यानी बच्च वयस्क का पिता है। यह बच्चा ही तो है जो बड़ा होता है, बड़ा होने पर भी हमारे अंदर सदा रहता है। हमें आशावादी और जीवित रखता है। सोचने-समझने को प्रेरित करता है। फिर इस पहेली को कैसे सुलझाएँ कि कौन पहले आया अस्तितव में? शायद जरूरत ही नहीं है इसकी।
हां, इस बच्चे को बचाए रखने में ही बड़ों की भी भलाई है, क्योंकि विकास की गुंजाइश रह जाती है, सहजता और सरलता बनी रहती है जीवन में। अँधेरी से अंधेरी रात में भी रौशनी आएगी, इस अवधारणा में विश्वास और ललक बनी रहती है।
तो मित्रों, बड़े छोटे सभी बच्चों के लिए हमने एक खूबसूरत बाल विशेषांक संजोया है इसबार-कई कई अच्छी और प्रेरक कविता कहानी और चित्रों के साथ। अपने खूबसूरत कार्टून और कहानी के साथ लेखनी में शामिल हैं नीलमणि। लेखनी परिवार में स्वागत है पहली बार रानी सुमिता जी का और गोलेन्द्र गोलू जी का व हमारी नन्ही लेखिका आद्रिका अग्रवाल का। फिर आज पहली मई के साथ-साथ बुद्ध-पूर्णिमा भी तो है-ज्ञान का दिन, अंधेरों में खुद ही दीप-सा प्रज्जवलित हो जाने का दिन…इससे अच्च्छा क्या महूर्त हो सकता है हमारे इस बाल-विशेषांक का लिए?
पढ़ें और आनंद लें।
रचनाएं कैसी लगीं? बताना मत भूलिएगा । आपकी राय ही हमारी दिशा निर्देशिका और प्रेरणा है।
एक स्नेहिल सूचना और आमंत्रण और, लेखनी का अगला अंक युद्ध और इसकी अर्थ हीनता, व निभीषिकाओं पर है। युद्ध के कारण और प्रभाव पर है। आपकी रचनाओं का हमें बेसब्री से इंतजार रहेगा।
रचना भेजने की अंतिम तिथि २० जून है निम्मांकित ई. मेल पर- shailagrawal@hotmail.com, shailagrawala@gmail.com पर।

शुभेच्छु,
शैल अग्रवाल