
पाँच लघुकथा
अनिल शूर आज़ाद
लघुकथा-१
माँ
रात्रि साढ़े दस बजे उसकी हरिद्वार की ट्रेन थी। निर्धारित कार्यक्रमानुसार उसने श्मशान-भूमि के विशेष कक्ष में रखी मां की अस्थियां ली और वहीं से सीधे स्टेशन पहुंचा। ट्रेन में सवार होकर उसने अस्थियों वाला लाल थैला बर्थ के साथ बनी खूंटी पर टांग दिया था।
अन्य यात्रियों को सोने की तैयारी में देख, वह भी लेट गया। बचपन से अब तक मां की स्नेहिल छाया में बीते वर्षों की कितनी ही घटनाएं, ढेरों यादें..उसके मन-मस्तिष्क में उमड़ने-घुमड़ने लगीं। बहुत छुटपन में रात को अकेले में जब उसे डर लगता तो मां उसे अपने साथ चिमटाकर सुला लेती थी। अंतिम-संस्कार के दिन मां को मुखाग्नि देते वक्त वह बुरी तरह भावविहल हुआ तो, कई मित्र एवं सगे-संबंधियों ने बड़ी मुश्किलों से उसे सम्भाला था। सुबह गऊघाट पर दसवें की विशेष पूजा के साथ ही मां अब, सदैव के लिए गंगा-मैया की पावन-अविरल धारा का हिस्सा बन जाने वाली थी।
ऐसे ही, देर तक विचारमग्न रहने के पश्चात उसने ध्यान किया – बत्तियां बुझाकर अधिकांश सहयात्री सो चुके थे। थकान तथा कई दिनों से ठीक से न सो पाने के कारण उसकी अपनी आंखें भी बोझिल हो चली थीं।
सहसा उठकर, उसने ‘लाल थैला’ उतारा और अपने साथ भींचकर सो गया।
***
लघुकथा-२
जेब वाली गंजी
अपने चार नजदीकी दोस्तों के साथ वह पहाड़ पर घूमने आया था। खूब मस्ती काट रहे थे सभी मित्र।
रात को होटल के कमरे में सोने के पहले, खूंटी पर टंगी अपनी पेंट से सारे पैसे निकालकर जब वह पहनी हुई अपनी गंजी के बड़े से जेब में, ठूंस रहा था तो सुधीर ने देख लिया। उसे बहुत अजीब लगा।
“साले..हमें क्या चोर समझता है जो तुम्हारी पेंट से पैसे चुरा लेंगे?” अन्य साथियों को भी बुरा लगा।
इस पर वह मुस्कराया “तुम सब तो मेरी जान हो, दोस्तो। तुम पर अविश्वास करने से मर जाना बेहतर लगेगा।”
“फिर पेंट से पैसे निकालकर, यों बनियान की जेब में डालने का क्या मतलब!” भीम ने भड़कते हुए टिप्पणी की।
“शांत, गदाधारी भीम..शांत हो जाइए।” मजाक में कहते सहसा वह फुसफुसाहट में उतर गया –
“1947 में लाहौर में पिता का जमा जमाया कारोबार था। हालात इतने बिगड़े की सब कुछ छोड़कर देर रात अचानक, पहने हुए कपड़ों में ही जान बचाकर भागना पड़ा था। कई दिनों तक भूखे प्यासे रहकर, परिवार अमृतसर पहुंचा तो सही – मगर छोटी बहन ने बुखार और भूख से बीच रास्ते दम तोड़ दिया था। ढंग से उसे दवा तक नसीब नहीं हुई। एकएक पैसे के लिए तरस गया था परिवार। वह ख़ौफनाक मंजर आज भी याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसीलिए गंजी भी मैं जेब वाली पहनता हूं..” कहते वह फफक उठा।
भौचक्के और निःशब्द होकर अब उसके दोस्त, उसका अश्रुपूरित चेहरा ताक रहे थे।
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लघुकथा-३
देशभक्ति बनाम मानवता
देशभक्ति एवं मानवता में एक बार बहस छिड़ गई कि बड़ा कौन, किसका महत्व ज्यादा! दोनों के एक से बढ़कर एक अपने तर्क। अंततः दोनों एक सिद्धपुरुष के यहां पहुंचे। कहा – अब आप ही फैसला कीजिए।
उस महात्मा ने उन्हें एक बड़े देशभक्त से मिलवाया। देशभक्त से पूछा कि इसी देश में क्यों जन्म लिया? देशभक्त हंसा – यह कैसा सवाल है, कोई किसी देश-विशेष में पैदा, अपनी मर्जी से थोड़े होता है! महात्मा ने फिर प्रश्न किया – किसी अन्य देश में पैदा हुए होते तब भी क्या इसी देश का गुणगान करते? देशभक्त गुस्साया – कैसी बात करते हो, जहां जन्म होगा गुणगान तो उसी जन्मभूमि-मातृभूमि का किया जाएगा ना।
इस पर सिद्धपुरुष हंसे। फिर बोले – देशभक्ति का सम्बन्ध जन्मस्थान से है जिसके निर्धारण पर हमारा कोई वश नहीं, जबकि मानवता सार्वभौमिकता का उच्च गुण रखती है। अतः निश्चय ही यह देशभक्ति से अधिक मूल्यवान है।
लड़ने वाले दोनों पक्षों ने सहमति में अपने सिर झुका दिए।
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लघुकथा-४
बड़ी मछली
व्यवसायी पिता ने सरोवर के नीले जल में झांक रहे अपने पुत्र को अर्थपूर्ण शब्दों में टोका – ‘देखा! हर बड़ी मछली, छोटी को कैसे खा जाती है..’
युवा पुत्र ने पिता की भावनाओं का खण्डन करते हुए सरोवर के दूसरे तट पर जल रही चिता दिखाकर कहा – ‘उधर देखिए! छोटी हो या बड़ी, हर मछली का यही हश्र होता है।’
वातावरण में एक गम्भीर खामोशी पसर गयी।
लघुकथा-५
डंडा
‘आज फिर गलत लिखा..बेवकूफ कहीं का! चल बीस बार इसे अपनी कापी में लिख।’
‘नही लिखूंगा!’ उसके स्वर की कठोरता देखकर मै दंग रह गया। मैंने पूछा ‘क्यों नही लिखोगे?’
‘पिताजी रोज दारू पीकर मारते हैं..कहते थे, अब एक महीना पूरा होने से पहले नई कापी मांगी तो बहुत मारूंगा..’ कहते हुए डंडा खाने के लिए अपने नन्हे हाथ उसने आगे कर दिए।
मैं उसकी डबडबाई आंखों में झांकता रहा। मेरा उठा हुआ हाथ जाने कब का नीचे ढ़रक गया था।
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मरद जात
बाजार से लौटा तो कामवाली बाई ‘सोना’ काम करने आ गई थी। उसकी छह वर्षीय प्यारी सी बिटिया भी आज साथ थी। यों ही ख्याल आया तो झोले से एक आम निकाल कर उसकी ओर बढाते हुए कहा, “लो बच्चे..क्या नाम है तुम्हारा?”
जाने क्या हुआ उसे कि “मम्मी!” चिल्लाकर दूसरे कमरे में अपनी मां की ओर उसने दौड़ लगा दी। बहुत हैरान-परेशान सा होकर मैंने सोना से पूछा, “अचानक क्या हुआ इसे! यह इस बुरी तरह डरकर कांप क्यों रही है?”
पाँच लघुकथा

गोवर्धन यादव, छिंदवाड़ा

लघुकथा-१
जब चिड़िया चुग गई खेत.
वीरेन्द्र और धर्मेन्द्र बचपन के जिग्री दोस्त थे. एक साथ खेले-कूदे.बड़े हुए और साथ ही सरकार नौकरी करते हुए सेवानिवृत हो गए. बस फ़र्क इतना-सा था कि वीरेन्द्र ने शहर में चार मंजिला फ़्लैट बना लिया था, वही धर्मेन्द्र ने गाँव में रहना उचित समझा था.गाँव में उसका मकान, और दस बीघा जमीन थी. वह अपने बेटे और बहू के साथ वहीं निवास करता था.
धर्मेन्द्र जब भी शहर आता, अपने मित्र से अवश्य मिलता और उसके हाथ-चाल जानता. एक कमरे में बैठकर दोनों घंटॊं गप्पे छानते. हंसते-हंसाते. वीरेन्द्र भी जब-तब अपने मित्र से मिलने के लिए धर्मेन्द्र के गाँव चला जाता. दोनों का बुढ़ाप चैन से कट रहा था.
एक दिन धर्मेन्द्र ने अपने मित्र वीरेन्द्र को समझाया कि कभी भूलकर भी अपना घर-जायजाद आदि अपने बेटे के नाम मत करना. उसने उसकी बात का खंडन करते हुए कहा-“ भाई धर्मेन्द्र ! अब उमर हो चुकी है. पता नहीं कब आँख बंद हो जाए. मैंने तो सोच रखा है कि जल्दी ही मैं अपना मकान-घर,जायदाद बेटे के नाम लिख कर गंगा नहा लूँगा. अरे भाई…एक न एक तो सारी प्रापर्टी उसकी होनी ही है.
एक दिन वीरेन्द्र ने अपनी सारी प्रापर्टी अपने बेटे के नाम लिख दी. कुछ दिन तक तो ठीक रहा, लेकिन जैसे ही घर की चाबी बहू के पास आई, उसने अपना रंग दिखाना शुरु कर दिया. पहले तो वह बड़े मनुहार के साथ भोजन कराती थी, उसका बड़ा ध्यान रखती थी, अब आए दिन चिकचिक होती थी.
वीरेन्द्र ने अपने बेटे से शिकायत की. बेटे ने टका का जवाब देते हुए कहा-“ पिताजी !.हमारे पास इतना समय नहीं है कि हम आपकी तिमारादारी करते फ़िरें.”
रोज-रोज की चिकचिक से बचने के लिए उसने निश्चय कर लिया कि वह अब वृद्धाश्रम में जाकर रहेगा.. ऐसा निश्चय करके उसने वृद्धाश्रम में अपना ठिकाना बना लिया था.
कुछ दिन बाद धर्मेन्द्र शहर आया. वीरेन्द्र के घर पहुँचा. देखता क्या है कि मकान पर उसके बेटे के नाम की नेमप्लेट लगी हुई थी. माजरा तो समझ में आ चुका था. कांपते हाथ से उसने कालबेल बजाई. बहू ने खिड़की की आड़ से झांक कर देखा.कौन आया है?.
देर तक प्रतिक्षा करते रहने के बाद भी जब दरवाजा नहीं खुला. तो वह उलटे पैर वापिस लौटने लगा. तभी मित्र के एक पड़ौसी ने उसे बताया कि रोज-रोज की झंझट से बचने के लिए वीरेन्द्र अब वृद्धाश्रम में रहने चला गया है.
धर्मेन्द्र के कदम अब तेजी से वृद्धाश्रम की ओर बढ़ चले थे.
दोनों की मुलाकात हुई. वीरेन्द्र, धर्मेन्द्र के गले लगकर फ़ूट-फ़ूट कर रोने लगा. रुदन करते हुए उसने कहा-“ धर्मेन्द्र ! तू सच कह रहा था, लेकिन मैंने तेरी बात नहीं मानी. उसी का परिणाम भुगत रहा हूँ.”
वीरेन्द्र ने उसकी पीठ पर हाथ फ़ेरते हुए सान्तवना देते हुए कहा-“ वीरेन्द्र ! अब पछताने से क्या होगा, जब चिड़िया खेत चुक गई . यह कहते हुए उसकी आँखे भर आयी थी.
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लघुकथा-२
प्रकृति :- एक पाठशाला.
“ अकंलजी…अकंलजी..आप बडी अच्छी कविताएँ लिखते हैं,कृपया मुझे भी कविता लिखना सिखाइये न !” एक प्यारी सी नन्ही-सी लड़की ने चहकते हुए शहर के ख्यातनाम कवि से अपनी तुतलाती भाषा में कहा.
कवि को सुनते ही बड़ा सोच हुआ कि कवि तो जन्मजात होता है. किसी को कवि बनाना इतना आसान काम तो नहीं है. लेकिन लड़की की जिद के आगे वे विवश हो गये. उन्होंने उस लड़की से कहा: बेटा तुम बड़ी होकर एक बडी कवियित्री बन सकती हो,लेकिन तुम्हे थोड़ा धीरज रखना होगा, और जैसा मैं कहूँ,उसे पूरा करना होगा. उस नन्ही बालिका ने उनकी शर्त मान ली.
दूसरे दिन उस कवि ने एक पौधा खरीदकर लाया और उसे रौंपते हुए कहा कि इसे रोज पानी पिलाना और इसकी अच्छे से देख-भाल भी करती रहना. पौधा जैसे-जैसे बड़ा होता जाएगा, तुममें कवि के गुण आते चले जाएंगे और तुम सचमुच मे एक कवियित्री बन जाओगी.
जैसा उन्होने कहा था ,वह लड़की रोज प्राणपन से उस पौधे की जड़ों में पानी डालती और उसकी देखरेख करती रहती. जैसे –जैसे लड़की बड़ी होती गई ,वैसे-वैसे पौधा भी आकाश की ओर बढ़ता रहा. कुछ दिन बाद कई पक्षियों ने उस पेड़ की डाली पर अपने घोंसले बनाने शुरु किए. एक अच्छा खासा पक्षियों का परिवार वहां बस गया था. वे तरह-तरह की बोलियां बोलते. लड़की पर इस माहौल का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगा और वह भावुक भी होती चली जा रही थी. उसकी सोच का दायरा भी बढ़ता चल जा रहा था, अब वह कुछ लिखने भी लगी थी. प्रकृति की संगत में रहकर कोई भी व्यक्ति कवि बन सकता है. यह निर्विवाद सत्य है.,क्योंकि प्रकृति एक पाठशाला भी तो होती है.
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लघुकथा-३
तेल की चोरी
दीपावली की रात सेठ गोविन्ददास की आलीशान कोठी जगमगा रही थी. सेठजी इस समय देवी लक्षमीजी की पूजा में व्यस्त थे.चौकीदार मुस्तैदी के साथ अपनी ड्यूटी निभा रहा था. तभी एक १२-१४ साल का लड़का दबे पांव आया और एक पात्र में दियों में से तेल निकालने लगा.चौकीदार के पैनी निगाहों से वह बच नहीं पाया. लडके को ललकारते हुये उस चौकीदार ने उसे पकड़ने के लिये दौड़ लगा दी. अपने पीछे उसे आता देखकर लडके ने भी दौड़ लगा दी.लेकिन पैर उलझ जाने से वह गिर पड़ा और और उसके हाथ का पात्र भी दूर जा गिरा.
अब वह चौकीदार की पकड़ में था. रौबदार कड़क आवाज में उसने लगभग डांटते हुये उस लड़के से तेल चुराये जाने का कारण जानना चाहा ,तो उस लड़के ने रोते हुये बतलाया” भैयाजी, माँ तीन दिन से बीमार पड़ी है.उसका बदन तवे जैसा तप रहा है.मैने उसके लिये खिचड़ी बनायी और माँ को खाने को दिया तो उसने मुझसे कहा कि यदि खिचड़ी को थोडे से तेल में छौंक देगा तो शायद उसे खाने में कुछ अच्छा लगेगा. घर में तेल की एक बूँद भी नहीं थी, तो मैने सोचा कि यदि मैं दियों से थोड़ा-सा तेल निकाल लूं तो काम बन जायेगा.इसी सोच के चलते मैंने तेल चुराने का मन बनाया था.”
लड़के की बात सुनकर चौकीदार का कलेजा भर आया. उसने अपनी जेब से पचास रुपये का नोट उस लड़के की तरफ़ बढाते हुये कहा”- ले ये कुछ पैसे हैं.किसी किराने की दुकान से खाने का मीठा तेल खरीद लेना और खिचड़ी फ़्राई कर अपनी माँ को खिला देना और बचे पैसॊं से दवा आदि खरीद लेना. जानते हो जिस तेल को चुराकर तुम भाग रहे थे,वह तेल करंजी का कड़वा तेल था. यदि तुम उस तेल से खिचड़ी फ़्राई करते तो उसको न तो तुम्हारी माँ खा पाती और न ही तुम”.
इतना कह कर वह वापिस लौट पड़ा. मुठ्ठी में नोट दबाये वह लड़का, तब तक वहीं खड़ा रहा, जब तक कि चौकीदार उसकी आँखों के सामने से ओझल नहीं हो गया
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लघुकथा-४
जीवन के सबसे बड़ी जरुरत- रोटी
एक दिन मैं अपनी स्कुटर सुधरवाने के लिये एक गैराज में बैठा था. वहाँ आठ-दस साल का एक लड़का हेल्पर के रुप मे काम कर रहा था. शायद वह नया-नया लगा था. मैकेनिक ने बगैर उसकी तरफ़ देखे १९-२० का पाना माँगा. लड्के ने एक पाना उठाया और उसके हाथ में पकड़ा दिया. वह पाना उस नम्बर का ना होकर कोई दूसरे ही नम्बर का था . सही पाना न पाकर उस मैकेनिक को क्रोध आ गया और उसने गंदी गालियाँ बकते हुये उसके गाल पर कस कर एक झापड़ मार दिया. लड़के की आँख छलछला आयी.
थोड़ी देर बाद वह मिस्त्री किसी आवश्यक कार्य से बाहर गया. मैने जिज्ञासावश उस लड़के से पूछा:- मिस्त्री तुम्हारा कौन लगता है.और कितनी तन्खाह देता है?.
लड़का थोडी देर तो चुप रहा ,फ़िर हलक को थूक से गिला करते हुये उसने कहा:-रिश्ते में तॊ कोई नहीं लगता…हाँ.. खाने को दो जून की रोटियाँ जरुर दे देता है..
मैने आश्च्रर्य से पूछा ’- केवल रोटियाँ,और कुछ नहीं ?
उस लड़के ने बड़ी मासुमियत से जबाब दिया” साहबजी….जिंदा रहने के लिये दो रोटियाँ ही काफ़ी है।
छोटी सी उम्र में उस लड़के ने श्रम के मुल्य को समझ लिया था।
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लघुकथा-५
..छोटी सी चिड़िया.
“ रामदीन…जरा बड़े बाबू को मेरे कमरे में भिजवाना”. बड़े साहब ने चपरासी को हुक्म बजा लाने को कहा.
“ मे आई कम इन सर”. बड़े बाबू ने कमरे में प्रवेश करने के पहले कहा.
“ हाँ, तुम अन्दर आ सकते हो”. साहब ने कहा.
“ देखो, मुझे बार घुमा-फ़िराकर कहने की आदत नहीं है. एक हफ़्ते के अन्दर मुझे पचास हजार रुपये चाहिए. इसका इन्तजाम कैसे हो सकता है,वह तुम जानो.”
“ बिल्कुल हो जाएगा सर. अप चिन्ता न करे.” “बड़ा बाबु अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया. उसने अपने टेबल की ड्राज से कोरे कागज निकाले. टाईपराईटर में फ़ंसाया और एक लेटर टाईप किया. और साहब के कमरे में जा पहुँचा.
“ ये क्या है ?” साहब ने कहा.
“ कुछ नहीं हुजूर…..यह एक छोटा सा कागज का पुर्जा है.
“ बड़े बाबू, तुम्हारा दिमाक खराब तो नहीं हो गया है. तुम जानते हो कि बीच सेशन में किसी का ट्रान्सफ़र नहीं किया जा सकता.”
“ हुजूर जानता हूँ. प्यारेलाल इसी शहर में कई बरस से कुण्डली मारे बैठा है. फ़िर उसकी बीवी भी सरकारी नौकरी में है. फ़िर हमने उसका ट्रान्सफ़र थोड़े ही किया है. उसे तो हमने प्रमोशन दिया है. मैं जानता हूँ वह इतनी दूर नहीं जाएगा. आर्डर मिलते ही वह सिर पर पैर रखकर दौड़ा चला आएगा. और हमें मनचाही रकम दे जाएगा. बस आप इस कागज पर अपनी छोटी सी चिड़िया बिठा दीजिए और देखिये ये चिड़िया क्या कमाल दिखाती है”.
“ समझ गया. तुम बहुत ही होशियार आदमी हो”.
“सर, ऐसी बात नहीं है. मैं तो आपका सेवक हूँ. और आपकी सेवा करना ही मेरा धर्म है”.

पाँच लघुकथा
पूरन सिंह
लघुकथा-१
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लघुकथा -2
पेट
अमोधा मजदूरी करता है। पिछले एक सप्ताह से घर पर बैठा है काम नहीं लगा। वह मिश्राईन जिज्जी को जानता है। वे बहुत दयालु हैं। उनके नाती का परसों जन्मदिन था। खूब अच्छे-अच्छे पकवान बने थे। मिश्राईन थोड़ा तो खाना बनाती नहीं है। उसी में से बच गया था काफी खाना। अमोधा उनके घर के सामने से निकल रहा था सो आवाज दी थी, ‘अमोधा।’
‘जी जिज्जी।’
‘कुछ खाना रखा है। परसों नाती का जन्मदिन था। उसी का बचा हुआ। ले जाओगे। बच्चे खा लेंगे। अच्छा खाना है।’ लगभग बेकार हो चुके खाने को अच्छा खाना बताते हुए मिश्राईन ने कहा था।
‘जिज्जी अभी काम देखने जा रहे हैं लौटकर आकर ले लेंगे।’ दोनों हाथ जोड़कर बोला था अमोधा।
‘अभी ले, तो ले ले, नहीं तो मैं कुत्ते को फैंक दूंगी।’ न जाने क्यों गुस्सा आ गया था मिश्राईन को।
अमोधा एक पल को रुका। सिर से अंगोछा बांधे था। उतारा और दोनों हाथ फैलाकर बोला, ‘तो ले आओ जिज्जी।’
मिश्राईन दो दिन पहले अपने नाती के जन्मदिन का बचा हुआ खाना एक पौलीथिन में भरकर ले आई थी। अमोधा ने पोलीथिन अपने अंगोछे में बड़ी अच्छी तरह से रख ली थी।
मैं देख रहा था। मेरे तन बदन में आग लग गई। मिश्राईन पर तो गुस्सा आया ही कि इस बुसे (खराब हुए) हुए खाने को एक गरीब को दे रही है और ये…….ये अमोधा इसमें जरा भी स्वाभिमान नहीं है जिस खाने को कुत्ते को दिया जाना है उसे ही ले लिया। सम्मान मर गया है क्या।
जब मिश्राईन अंदर चली गई तो मैंने अमोधा से पूछा, ‘क्यों रे, जो खाना कुत्ते को दिया जाना था उसे तुझे दे दिया और तूने उसे ले भी लिया। साले, तू कुत्ते से भी गया गुजरा है………..मान-अपमान नाम की चीज होती है कि नहीं……..स्वाभिमान मर गया है तुम्हारा, सालो।’
उसने मुझे देखा। कतई गुस्सा नहीं हुआ। बहुत विनम्रता से बोला, ‘साहब मान, सम्मान, स्वाभिमान सब जानते हैं हम…..पिछले सात दिन से काम नहीं लगा। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं है। दो दिन से चारों बच्चे भूखे हैं। ये…ये खाना ले जाएंगे तो वे पेट भरकर खा लेंगे।’ फिर अपना पेट खोलकर दिखाते हुए बोला था, ‘पेट…पेट, समझते हैं आप….।’ मैं बड़ी देर तक देखता रहा था उसे फिर उसे अपनी दोनों बाहों में भर लिया था। हम दोनों न जाने क्यों बड़ी देर तक बिलखते रहे थे।
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लघुकथा-३
मन
मैंने उन्हें कभी मना नहीं किया चाहे वे दिन ही क्यों न रहे हों, जब स्त्री को अपने ही शरीर से घिन होती है या फिर चाहे मेरा शरीर दर्द से टूट रहा होता या फिर बुखार से तप रहा होता। वे हमेशा यही कहते, ‘तुम्हारी अंगुलियों की छुअन से ही मेरे शरीर में कुछ-कुछ होने लगता है।’ और थोड़ी ही देर मेरे शरीर से खेलने लगते फिर आर-पार के फैसले पर उतर आते। मैं हमेशा यही सोचती इनकी खुशी ही मेरा सर्वस्व है फिर भी अंदर ही अंदर कुछ चटकने लगता, बिखरने लगता, ‘क्या मेरी अंगुलियों की छुअन के अलावा मुझमें और कुछ भी नहीं है या फिर……।’ लेकिन कभी मुँह खोलकर कह न सकी। और इसी में जीवन के 28 साल निकल गए। नानी, दादी सभी बन गई, मैं।
परसों रात उन्होंने पूछा, ‘मन कैसा है।’ जिसका सीधा अर्थ था, ‘तुम तैयार होमैं अपनी अंगुलियों उनके छाती के सफेद बालों में घुमाने लगी।
‘तुम्हारी उंगलियों की छुअन।’ वे पागल होने लगे। हालांकि उनसे अब कुछ भी नहीं हो पाता। असमर्थ तो मैं भी हूँ। मैंने न जाने कैसे हिम्मत जुटाई। ‘मेरी अगुलियों की छुअन के अलावा और कुछ अच्छा नहीं लगता तुम्हें, मुझमें।’
वे कुछ नहीं बोले। अपने हाथ यहाँ-वहाँ घुमाते रहे।मैं फिर बोली, ‘अच्छा एक बात बताओ, मन समझते हैं आप। वह वाला नहीं जिससे आप शुरुआत करते हैं वो वाला नहीं।’
‘हाँ।’ उनकी अगुलियों तो अब भी चल रही थी यहाँ-वहाँ।
‘तो पिछले अट्ठाईस सालों में मेरा मन क्यों नहीं जान पाए। सिर्फ आपके वाला मन ही आप पर क्यों हावी रहा।’ मेरे ऐसा कहने पर वे कुछ नहीं बोले, करवट बदली और खर्राटे भरने लगे थे।
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लघुकथा-४
दरिद्र आदमी
आलोक कुमार साहब पिछले माह रिटायर हुए हैं सरकारी सेवा से। शुरू – शुरू में तो सब ठीक रहा। ऑफिस के लोग और अन्य साथी बातें कर लेते थे लेकिन अब बिल्कुल अकेले हैं। पत्नी जब वे सेवा में थे तभी साथ छोड़ गईं थीं। बेटा नौकरी करता है उसके बीवी-बच्चे हैं। बेटी पराए घर चली गई। समय नहीं कटता सो कभी – कभी टी वी देखने लगते हैं।
उस दिन टी वी देख रहे थे। शायद कोई फिल्म थी। याद आया दरिद्र आदमी।
फिल्म के हीरो को देख खुद ही सोचने लगे थे ..
.. तब खूब जवान थे। सुंदर भी बहुत थे। नौकरी लगी तो शुरू से ही अधिकारी बने। जीवन में न जाने कितनी लड़कियां आई, औरतें आईं। सभी से शारीरिक संबंध रखे। न रिश्ता देखा, न मर्यादाएं, सिर्फ शरीर हवी रहा। चाची, मौसी, बुआ, भाभी, दूर के रिश्ते की बहिनें सबके साथ शरीर से जुड़े रहे। हर रात दिवाली रही और हर दिन ईद लेकिन प्यार किसी से नहीं रहा। अब जीवन के दूसरे छोर पर हैं। अकेले हैं। कितनों के तो नाम भी याद नहीं। अगर सच्चा प्यार किया होता तो कोई याद आता। उसी की याद में जीवन निकाल देते। पत्नी थी वो जीवनसाथी थीं, प्यार नहीं। सोचते-सोचते आँखों की कोरों से कुछ चूने लगा था। हथेलियाँ लगा दीं थीं। आँसू पोंछ लिए थे कि .. कि .. न जाने कानों में कोई कहने लगा, ‘आलोक बाबू, प्रेम और देह एक दूसरे के पर्याय कभी नहीं होते.. प्रेम धनवान बनाता है तो वहीं देह (शरीर) दरिद्र..आप दुनियाँ के सबसे दरिद्र व्यक्ति हैं।’
मानो जाग गए हों आलोक बाबू। चारों ओर देखा। कोई नहीं था। सामने टी वी चल रहा था। फिल्म तो न जाने कभी की खत्म हो गई थी।
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लघुकथा-५
भूत
बाबा बहुत मेहनत करते थे लेकिन जमींदार बेगार तो करवाता था, पैसे नहीं देता था। कभी-कभार दे दिए तो ठीक नहीं तो नहीं। उन्हीं पैसों से किसी तरह गुजर होती थी।
एक दिन दोपहर को मैंने मां से कहा,‘‘बहुत भूख लगी है।’’
मां कुछ नहीं बोली उसने मिट्टी के बरतन उलट कर दिखा दिए थे।
मेरी भूख और तेज हो गई थी। भूख के तेज होते ही मस्तिष्क भी तेज हो गया था। पास ही श्मशान घाट था जहां बड़े .बडे लोग अपने बच्चों को भूत-प्रेत से बचाने के लिए नारियल, सूखा गोला पूरी-खीर कई बार मिष्ठान भी रख आते थे। यह सब काम दोपहर में होता था या फिर आधी रात को।
मैं श्मशान घाट चल दिया था। संयोग से वहां खीर पूरी और सूखा गोला रखा था। गोले पर सिंदूर और रोली लगी थी। मैंने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। मैंने जल्दी-जल्दी आधी खीर पूरी खा ली थी और गोला झाड़ पोंछकर अपनी जेब में रख लिया। आधी खीर पूरी लेकर मैं घर आया था। मेरा चेहरा चमक रहा था।
चमकते चेहरे को देखकर मां ने पूछा, ‘भूख से भी चेहरा चमकता है क्या¬। तू इतना खुश क्यों हैं?
मैंने बची हुई आधी खीर-पूरी मां के आगे कर दी थी। मां सब कुछ समझ गई थी। मां की आंखें छलक गई थी और उसने मुझे अपने आंचल में छिपा लिया था मानो भूत से बचा रही हो कि उसके होंठ फड़फड़ाने लगे थे, ‘भूत, भूख से बड़ा थोड़े ही होता है।’
मैं कुछ नहीं समझा था। मैं मां के आंचल में और छिपता चला गया था।
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