अनिता रश्मि, प्रेरणा गुप्ता, शोभना श्याम

पाँच लघुकथा

अनिता रश्मि

लघुकथा-१
सीख
बहुत खूबसूरत निर्झर, उतनी ही ख़ूबसूरत नदी। झरने से गिरता पानी नई नदी का निर्माण कर गहरी घाटी में बढ़ता जा रहा था। वह भी तो खूबसूरती की अद्भुत मिसाल।
आज पाँच छात्र इस प्रसिद्ध झरने को देखने के लिए वहाँ आ पहुँचे। सब तरफ की सुंदरता से उनकी बाँछें खिल गईं।
चट्टान पर चढ़कर वे सेल्फी लेने लगे।
हँसी-खिलखिलाहट का बाजार गर्म। एकाएक राहुल का संतुलन गड़बड़ा गया।
वह पानी के अंदर… गुड़ुप!
सब मित्र चिल्लाने लगे। आस-पास के पर्यटक अब सेल्फी लेकर इधर-उधर पोस्ट करने में व्यस्त। दोस्तों की रूलाई फूट पड़ी लेकिन वे उतनी गहरी नदी में उतरने की हिम्मत नहीं जुटा सके।
एकाएक एक स्थानीय किशोर नदी में कूदा। थोड़ी देर में बालों से खींचकर राहुल को बाहर निकाला। और पीठ के बल उसको लिटा दिया। उसकी पीठ दबा-दबाकर पेट से पानी निकालता रहा।
अब राहुल स्वस्थ। सेल्फी के दीवाने अब भी व्यस्त! मस्त! उसकी भी लेनी चाही।
देहाती किशोर बेसाख्ता बोल पड़ा,
“जब कोई डूबता है तो उसे बचाने के लिए कूदना पड़ता है, सेल्फी नहीं ली जाती।”

लघुकथा-२
जमीर
ये दिन भी आएँगे, कहाँ सोचा था। सच ही कहते थे दादा-दादी, माँ-बाबूजी,
“सबकी नजरों से छिप सकता है आदमी, अपनी नजरों से नहीं।”
आज वे शिद्दत से याद आ रहे हैं। मैं बेकार में उनकी बातें काटता रहता था। वे पुरातन और अद्यतन को साथ लेकर चलने की बात कहते रहे सदा। क्रोध पर लगाम लगाने का तरीका भी बताया। और मैं लापरवाह।
जेल की सलाखें चारों ओर से घेरती आ रही हैं। छोटी सी सीलनभरी अँधेरी कोठरी में इन सलाखों ने गला चोक कर रखा है। आत्मग्लानि से मेरा दम घुट रहा है।
शैली की निष्पाप आँखें, मासूम चेहरा सामने नजर क्यों आ रहा है? मैंने शैली को मार डाला था। खून में डूबती जाती शैली चीखती रही थी। पर उसकी हत्या करने के बाद भी प्रेम खत्म नहीं हो पाया है। सही में मैंने बहुत जघन्य अपराध कर डाला है। ओह! अब पछताए होत क्या?
शैली मेरे अभिभावक की बात मानकर ‘लिव इन’ के लिए न कह रही थी। उसने इंकार ही तो किया था न। शैली का वह इंकार इतना तो बड़ा नहीं था कि उस पर चाकू से अनगिन वार…ओह!
नहीं, नहीं! वकील लाख कहता-समझाता रहे, मैंने फैसला कर लिया है। मैं कल सुनवाई के समय जज के सामने कबूल लूँगा,
“हाँ! मैंने अपने प्यार का गला घोंट डाला है। उससे भी अधिक ‘अपने परिजनों’ के विश्वास का, उनकी आस्था का।”
“मुझे आपकी दी हुई हर सजा मंजूर है जज साहब!”

आऽह! मन में सुकून! जैसे एकाएक ताजी, शीतल हवा का स्पर्श! आज यहाँ पहली बार अच्छी नींद आएगी।

लघुकथा-३
बदला

“क्या समय आ गया। अब तो झूमने में भी डर लगता है।”
“क्यों भला?”
“किसी की नजरों में आ जाऊँ और वह कुल्हाड़ी तेज कर ले।”
अपने तट पर खड़े-अड़े आखिरी पेड़ के भय से नदी को भी भय लगने लगा।
“अरेऽ! सही कहा। मुझ पर भी शिकारियों की निगाहें पड़ गई हैं। मैं भी तो मार दी जाऊँगी।”
“नहीं! तुम्हें कौन मारेगा? अब तो प्लास्टिक पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है न?”
भरे-पूरे काले बादलों को मचलते देखकर पेड़ ने कहा।
नदी को कुछ जवाब नहीं सूझा। बस, उसने सहमते हुए एक उँगली ढलान की ओर उठा दी। पेड़ धीरे से उस ओर घूमा। दूर पर ठीक नदी के बीचों-बीच माटी भरकर एक बिल्डिंग खड़ी थी, दूसरी खड़ी हो रही थी, तीसरे की नींव पड़ चुकी थी।
बिल्डिंग की गर्वीली खिलखिलाहट दोनों तक पहुँच रही थी।
“तुम्हारे भीतर अभी भी जल का सैलाब है न?”
“हाँ, है।”
पेड़ ललकारते हुए उसके लिए जोर-जोर से झूमने लगा,
“तो तुमको हनुमान जी की याद दिलानी पड़ेगी?”
तत्काल काले डरावने हाथी सम विशाल बादल आकाश की छाती पर छा गए।
नदी के अंदर-बाहर हदहदायल पानी आ गया। उसने तेज गति से बिल्डिंग और नींव की खिलखिलाहट को गटकने के लिए दौड़ लगा दी।

लघुकथा-४

स्वाभिमान

उस मुहल्ले में बहुत दिनों बाद आई है चमेली। आँगन में बैठ ढोलकी की रस्सी को खींच-खींचकर सँभाला उसने। फिर मारे दो थाप। अब उसके गले से एक से एक सोहर और बधाइयाँ निकलने लगीं।
चाभियों के गुच्छे की छनक गजब संगीत पैदा कर रही थी। अब भी घर की मालकिन शर्मीली चाबियाँ कमर में खोंसे रखती हैं।
थोड़ी देर बाद उसने साथिन हिजड़े को ढोलकी थमा दी। खुद नवजात को गोद में लेकर, गोल-गोल फिरकनी लेने लगी। सूप पर लिटाकर नवजात को निहुछा। पुनः गोलाकार घूमती हुई नृत्य किया और आशीष की झड़ियों संग मालकिन की गोद में दे दिया।
“लो चमेली। चार हजार एक हैं।”
“नहीं! रख लीजिए।”
“ओह, तो ज्यादा चाहिए? चलो पाँच हजार…मेरे बीमार बच्चे को इतना कीमती आशीर्वाद दिया है तुम चारों ने।”
“अरे! नहीं, वह बात नहीं है।”
“बात क्या है?”
“अब हाथ फैलाने की जरूरत नहीं रही। अब नजरें नीची नहीं कर सकती कभी।”
आश्चर्य से ताकती शर्मीली को देखा चमेली ने। कहा,
“हमको टीचर की नौकरी मिल गई है।”
आत्मविश्वास के साथ उसने बच्चे के सर पर हाथ रखा।
“आपके घर हमेशा इज्जत मिली है। इसीलिए बच्चे को आशीर्वाद देने से खुद को रोक नहीं पाए हम।”

लघुकथा-५
अंतर

पर्यटकों के स्वर्ग कश्मीर में चिल्ले कल्लां (अत्यधिक सर्दी ) का समय। चालीस दिनों से सदा की तरह सारे काम-काज ठप्प हैं।
होटल की खिड़कियों से लगे पर्यटकों को रुई के फाहों से गिरते हिम किलकारी मारने पर विवश कर रहे हैं।आए दिन की बर्फबारी देखकर पर्यटक फूले नहीं समा रहे हैं।
इसी के लिए तो वे यहाँ एक महीने से हैं। चारों ओर बर्फ की धवल खूबसूरत चुनरी उन सबमें उल्लास राग जगा गई है।
गिरीश भी रतलाम से आए हैं। आज गिरीश दोपहर को बाहर निकले। सामने जमीन एकदम श्वेत। निगाहों की जद में दूर तक बस बर्फ ही बर्फ।
बहुत कम लोग नजर आ रहे थे। कुछ बर्फबारी देखने के लिए रुक गए पर्यटक, कुछ हाथों में शाल, स्वेटर, मफलर, पोंचो थामे लबादा-फिरन पहने लोग। कुछ भुट्टे बेचते लोग भी थे।
गिरीश की आवाज में बर्फ़ीली कँपकपाहट,
“हम पर्यटक स्नो फॉल के बाद का नजारा देखने के लिए होटल से बाहर आए हैं। इतनी ठंड में आप क्यों?”
उन्होंने भुट्टेवाले से भुट्टा खरीदते हुए पूछा।
“आपकी सेवा करने।”
“अरे! चिल्ले कल्लां में क्या जरूरत…?”
“…जुरूरत है न साब जी! इस बार सीजन बेकार गया। हम एक भी शॉल-स्वेटर बेच नहीं पाए थे। तब सातों कमाऊ लोग बीमारी में फँस गए थे।”
उसने गर्मागर्म भुट्टा उनके हाथ में पकड़ाया।
“आपके लिए बर्फ आन्नद है जी। और हमारे लिए…।”
उसने बात अधूरी छोड़कर भुट्टे समान दाँत निपोर दिए।

पाँच लघुकथा

प्रेरणा गुप्ता, कानपुर


लघुकथा-1
भय की कगार पर
सीढ़ियां चढ़ती जैसे ही मैं छत पर पहुँची, इधर से उधर बलखाती गिलहरियाँ, आपस में बतियाते कबूतर और ऊपर आसमान में चमकता सूरज अपनी बुलंदियों पर था।
अहा! कितना मनोरम दृश्य था। अचानक मन में ख्याल आया, क्यों न कैद कर लूँ इन सबको अपने कैमरे में…।
फोकस बनाया ही था कि एक कबूतर महाराज मुंडेर पर बैठे कनखियों से मेरी ओर देख रहे थे। मैं ठिठक गयी, मैंने उससे पूछा, “ऐ कबूतर! तनिक बताओ तो, तुम मुझे इस तरह से क्यों देख रहे हो?”
उसने गर्दन मटकाते हुए आँखें मिचमिचाईं।
मैं फिर बोली, “देखो, मैं धूप सेकने आई हूँ। क्या तुम भी अपने पंखों को धूप दिखा रहे हो? अच्छा, छोड़ो तुम न समझोगे मेरी ये सारी बातें।”
उसने भी जैसे मुझे इग्नोर किया।
मैं फिर बोल उठी, “वैसे दोपहर भर तुम्हारी गुटरगूँ मुझे बहुत डिस्टर्ब करती है और सुना है कि तुम वजन में बहुत भारी होते हो?”
इस बार उसने अपने पंख फड़फड़ाए। मुझे लगा कि जैसे शायद वह कह रहा था कि, “भारी तो तुम इंसान हो इस धरती पर, और हम परिंदों पर। न तो तुमने पेड़-पौधे छोड़े। ऊपर से चारों तरफ प्रदूषण फैला रखा है। त्योहारों पर तो माइक लगाकर, न जाने क्या-क्या फुल वाॅल्यूम में बजाते रहते हो। अब तुम्हीं बताओ, कौन किसको डिस्टर्ब करता है? और कौन किस पर भारी है?”
मैं हैरान थी, अरे! ये तो सब कुछ समझता है।
उसने फिर अपनी गर्दन मटकाई, जैसे वह कह रहा था कि “तुम तो मन के पंख लगा कर उड़ा करती हो, लो देखो मेरे पंख। ये देखो, मैं उड़कर दिखाऊँ?”
“अरे रे रे! तनिक ठहरो तो, एक तस्वीर तो उतार लूँ तुम्हारी। फेसबुक पर डालनी है ना, अपने दोस्तों को दिखाने के लिए।”
इस बार उसकी फड़फड़ाहट से मानो फिर आवाज आई। “लो, कर लो कैद हमें तस्वीरों में, तुम्हारी भावी पीढी के काम आएँगी, ये बताने को कि कोई कबूतर नाम का भी प्राणी होता था इस संसार में, वह भी डायनासोर की तरह विलुप्त हो गया।” और वह पंख फड़फड़ाता आकाश में उड़ गया।
तस्वीर तो मैंने ले ही ली थी, मगर आँखों के सामने अँधेरा-सा छा गया। दिल में ख्याल आया कि विलुप्त प्राणियों की लिस्ट में कहीं हम इंसान भी तो नहीं… ?

लघुकथा-२
लिपस्टिक
ऑटो से उतरते ही, मैं ग्रॉसरी स्टोर की ओर बढ़ चली कि अचानक सामने काॅस्मेटिक शाॅप पर लगे लिपस्टिक के विज्ञापन को निहारती लेडी को देखकर मैं ठिठक गयी। पीठ तो उसकी मेरी तरफ थी मगर आकृति, बेहद जानी पहचानी …। धीरे-धीरे कदम बढ़ाती, मैं उसके करीब पहुँच गयी … “हाय नम्रता! तेरा लिपस्टिक का शौक़ अभी तक बरकरार है!”
“कौन …? वृंदा! ओ माय गॉड! तूने तो मुझे डरा ही दिया।”
बरसों बिछड़ी सहेलियाँ आपस में गले मिलती, काॅफ़ी हाउस में आ बैठीं। बातों का सिलसिला जो शुरु हुआ कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था।
बातें तो चली ही रही थीं, मगर बार-बार मेरी नजर उसके होठों पर जाकर ठहर जाती।
अचानक मैं पूछ बैठी, “एक बात बता नम्रता, तू तो प्रिंसिपल थी ना स्कूल में। सुना था कि तेरे ससुराल वाले, इतना पढ़ी-लिखी होने के बाद भी तुझे तंग करते थे। फिर भी तू बनी रही वहाँ! आखिर क्यों?”
वह खिलखिला पड़ी, “अरे! तो क्या करती? छोड़ देती?”
मैं हड़बड़ा-सी गयी, “अरे नहीं-नहीं, ये मतलब नहीं था मेरा। मतलब तेरे पापा-मम्मी चाहते तो तेरी दूसरी शादी …।”
“वृंदा, ज़रूरी तो नहीं कि दूसरी शादी में भी सब कुछ ठीक ही मिलता।”
“हाँ, तू कह तो सही रही है।”
“माँ को जब पता चला तो बोली, ‘देख, अपनी लड़ाई तो तुझे ख़ुद ही लड़नी होगी। जहाँ भी जाएगी, शोषण करने वाली ये प्रजाति हर क्षेत्र में मिलेगी। तू प्रिंसिपल है ना, स्कूल में। जा, अब घर में भी बन जा प्रिंसिपल, सिद्धान्तों के साथ।”
उसकी बातें सुनकर, मेरी आँखें फैल गयीं। “और पापा …?”
“उन्होंने तो ऐसी बात ही कह दी कि … ‘कार चलाना जानती है ना बेटी, ज़िंदगी की गाड़ी चलाना भी सीख ले अबI’ बस तब से टेढ़े-मेढे़ रास्तों पर ड्राइवरी करती चली आ रही हूँ, कुशल चालक की तरह।” कहते हुए उसका चेहरा दमक उठा। “लेकिन एक बात बता, तू मेरे चेहरे में क्या देखे जा रही है जब से?”
“वही, तेरे होठों पर लगी लिपस्टिक, जिसे देखकर याद आया कि एक बार तूने कहा था, लिपस्टिक ख़रीदना ही काफ़ी नहीं, उसे लगाने का सलीका भी ज़रूर आना चाहिए।”
उसने धीरे से मेरा हाथ थाम लिया। “तो चल आज एक लिपस्टिक तू भी ले ले, मेरी मनपसन्द शेड की।”
मैंने भी उसका हाथ थाम लिया और मुस्कुराते हुए उठ खड़ी हुई, एक लम्बी साँस लेने और उससे भी लम्बी छोड़ने के साथ।
आज तो लिपस्टिक की परिभाषा ही बदल दी थी सहेली ने मेरे लिए, मैं दुःख छुपाने के लिए लगाती थी और वह आत्मविश्वास बनाए रखने के लिए।
प्रेरणा गुप्ता – कानपुर
लघुकथा-३
बेताल के आँसू
विक्रम भी कुछ कम नहीं था। पीछा करते हुए फिर से पेड़ के नीचे जा पहुँचा और पेड़ पर चढ़, शव को कंधे पर लादकर नीचे उतर आया तथा तान्त्रिक के यज्ञ-स्थल की ओर चलने लगा।
उफ्फ!
विक्रम अभी कुछ ही कदम चला था कि कंधे पर लदा बेताल उसकी थकान महसूस कर फिर चालू हो गया।
“हाँ, तो सुनो राजन! आज एक नयी कहानी :
एक आदमी था, जंगल-जंगल हरियाली के बीच घूमा करता था। कभी नदी के तट पर बैठा दिखाई पड़ता तो कभी पहाड़ों पर चढ़कर सूरज-चाँद-सितारों को निहारता। यही नहीं, सरसराती हवाओं से न जाने क्या गुफ्तगू किया करता था?
लोग उसे ‘बावला’ कहने लगे थे।
एक दिन कुछ लोगों ने कौतूहलवश उसे रोककर पूछा, “क्यों भाई! तुम इन पेड़-पौधों, बादलों वगैरह में क्या देखा करते हो?”
उसने मुस्कुराकर कहा, “प्रेम।”
“प्रेम?” सभी ठठाकर हँस पड़े, “लगता है तुम्हें किसी से प्रेम नहीं हुआ या फिर किसी ने तुमसे प्रेम किया ही नहीं। माता-पिता ने तो किया होगा …?”
उसने निर्विकार भाव से जवाब दिया, “उनके लिए तो मैं मात्र खिलौना था।”
“मित्रों ने?”
“उनके लिए, समय व्यतीत का साधन।”
“फिर, पत्नी ने तो जरूर ही किया होगा।”
“नहीं, वो प्रेम नहीं वासना थी।”
“अरे भई, किसी से तो हुआ ही होगा, भाई-बहन या फिर बच्चों से …।”
“ना-ना, भाई-बहन के बीच लालसा थी और बच्चों के संग स्वार्थ।”
“ओह! बेचारा।”
इस सहानुभूति का उसने कोई जवाब नहीं दिया, निर्विकार भाव से आगे बढ़ चला।
“अच्छा, तो अब यह बताओ राजन, जैसा कि हम सभी जानते हैं कि इस सृष्टि की उत्पत्ति प्रेम से हुई है, फिर उस आदमी को किसी भी इंसान से प्रेम क्यों न हुआ?”
उसने गूढ़ निगाहों से बेताल की आँखों में झाँका।
“अरे! तुम तो बड़े वीर-पराक्रमी, अपने घर के राजा हो। जानते-बूझते जवाब नहीं दोगे तो, तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े …।”
“फूल-पत्ते, हवा, बादल और नदियाँ वगैरह तो प्रकृति के नियमों से बँधकर बिना किसी शर्त के हर किसी से प्रेम करने को बाध्य हैं; लेकिन इंसान, बौद्धिक स्तर ऊँचा होते हुए भी वह इच्छाओं के वशीभूत, प्रेम का व्यापार करने में लग पड़ा है।” विक्रम ने कहा।
बेताल हतप्रभ हो उसे देखता रह गया। एकाएक उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। वह उदास आवाज में बोला, “ठीक कहा राजन! प्रेम व्यापार न बना होता और विश्वास हत्यारों के हत्थे न लगता तो बेमौत मारा जाकर मैं बेताल न बनता और तुम भी… ! बहरहाल, तुम्हारा मौन टूट गया, मैं चला।” और हवा में छूमंतर हो गया।

लघुकथा-४
चमगादड़

अहा! मजा आ गया। लगता है, आज फिर चमगादड़ घुस आया। चीख-पुकार मची हुई थी।

वो भी एक जमाना था, जब वह जानती भी न थी कि ‘डर’ नाम की चिड़िया होती क्या है? अकेले यात्रा करना, अँधेरे में कहीं भी चले जाना।

विवाह के बाद ससुराल में सबकी डराती हुई आँखों, तेज आवाजों का सामना करते-करते, न जाने कब उसके अन्दर डर की चिड़िया ने बसेरा कर लिया था।

एक दिन, उसका पति तेज आवाज के साथ आँखें निकालकर उसे डरा-धमका रहा था। तभी, घर के बाहर पीपल के पेड़ से एक चमगादड़ उड़ता हुआ कमरे में आ घुसा और चारों ओर चक्कर काटता अपने जलवे दिखाने लगा। उसे सिर पर मँडराता हुआ देख पति की आँखें भयभीत होकर सिकुड़ गईं और वह दहशत से हाय-तौबा मचाने लगा। उसका ये हाल देखकर वह ख़ुशी से बोल पड़ी थी, “वाह! एक इंसान को डराकर अपनी वीरता का प्रदर्शन करने चले थे, एक चमगादड़ भी न भगा पाए!”

फिर उसने चमगादड़ को खदेड़कर ही दम लिया था। मगर चमगादड़ के साथ, उसके अन्दर बसी, ‘डर वाली चिड़िया’ भी भाग निकली थी।

आज फिर चमगादड़ अपने जलवे दिखा रहा था, और वह अपना मुँह ढाँपे, खिलखिलाती हुई मन ही मन उसे धन्यवाद दे रही थी—‘हे चमगादड़! तू ऐसे ही आते रहियो और डराने वालों पर अपनी दहशत फैलाते रहियो।’

लघुकथा-5
मृगतृष्णा

दो दिन में ही नीतू ने गीतांजलि का मन मोह लिया था। हँसती तो मानो फूल झड़ते। अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी और कहाँ उसका पति सुमित, ऐसी पत्नी पाकर तो उसके भाग्य खुल गये।

आज नीतू वापिस जा रही थी। गीतांजलि उसके साथ उसे छोड़ने स्टेशन के लिए रवाना हो गयी। कार ड्राइव करते हुए वह उससे बातें भी करती जा रही थी।

“नीतू, तुम्हारे साथ दो दिन ऐसे बीते कि पता भी न चला। मालूम है? तुम्हारा जब फोन आया था कि तुम मुझसे मिलने आ रही हो तो मैं असमंजस में पड़ गई थी। “हे भगवान! ये मेरे पास क्यों आ रही है? हमारी तो ज्यादा मुलाकात भी नहीं है। वैसे भी मैं तुम्हारी दूर की जिठानी लगती हूँ।”

नीतू खिलखिला पड़ी। “भाभी, ये सब मैं नहीं जानती। हमारा तो सिर्फ प्यार का रिश्ता है। फिर, मैं आपको जी भर के देखना भी चाहती थी। कहकर वो चुप हो गयी।

“जी भर कर मुझे देखना…? समझी नहीं मैं।”

वह चुप थी।उसकी चुप्पी गीतांजलि को रहस्यमयी-सी लगने लगी। उसका अंर्तमन उसे कुरेदने लगा था, मगर वह स्टीयरिंग सम्हालने में लगी थी।

“नीतू, तुम कुछ कह रही थी न?”

“लीजिये भाभी, स्टेशन भी आ गया।”
कुली के साथ दोनों भागती हुई प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंँच गईं। ट्रेन आ चुकी थी। सामान जँचाकर नीतू जैसे ही अपनी बर्थ पर बैठी, सिग्नल ग्रीन हो गया।

“अच्छा नीतू! पहुँचकर फोन करना और सुमित को मेरा स्नेह बोलना।” कहते हुए गीतांजलि ने नीतू का हाथ अपने हाथ में ले लिया।

उसने भी कसकर उसका हाथ थाम लिया और प्यार भरी नगाहों से देखते हुए बोली, “आपका नाम सुनकर वो खुश हो जायेंगे…, आप जानना चाहती थीं न कि मैं आपको जी भरकर क्यों देखना चाहती थी? क्योंकि… ।“ कहते-कहते उसका गला रुंध गया ।

“हाँ-हाँ बोलो …।”

वह भर्राई हुई आवाज में बोली, “आपको नहीं मालूम, मैं जब से शादी होकर आई हूँ, सुमित के दिलोदिमाग में बस आप…। वो आपको चाहते हैं, मुझे नहीं।”

सुनते ही गीतांजलि ने झट से अपना हाथ अपनी ओर खींच लिया, मानो उसे बड़ी जोर से करेंट मार गया था। ट्रेन जा चुकी थी, मगर वह जहाँ के तहाँ खड़ी रह गयी।
लघुकथा : ‘चमगादड़’

अहा! मजा आ गया। लगता है, आज फिर चमगादड़ घुस आया। चीख-पुकार मची हुई थी।

वो भी एक जमाना था, जब वह जानती भी न थी कि ‘डर’ नाम की चिड़िया होती क्या है? अकेले यात्रा करना, अँधेरे में कहीं भी चले जाना।

विवाह के बाद ससुराल में सबकी डराती हुई आँखों, तेज आवाजों का सामना करते-करते, न जाने कब उसके अन्दर डर की चिड़िया ने बसेरा कर लिया था।

एक दिन, उसका पति तेज आवाज के साथ आँखें निकालकर उसे डरा-धमका रहा था। तभी, घर के बाहर पीपल के पेड़ से एक चमगादड़ उड़ता हुआ कमरे में आ घुसा और चारों ओर चक्कर काटता अपने जलवे दिखाने लगा। उसे सिर पर मँडराता हुआ देख पति की आँखें भयभीत होकर सिकुड़ गईं और वह दहशत से हाय-तौबा मचाने लगा। उसका ये हाल देखकर वह ख़ुशी से बोल पड़ी थी, “वाह! एक इंसान को डराकर अपनी वीरता का प्रदर्शन करने चले थे, एक चमगादड़ भी न भगा पाए!”

फिर उसने चमगादड़ को खदेड़कर ही दम लिया था। मगर चमगादड़ के साथ, उसके अन्दर बसी, ‘डर वाली चिड़िया’ भी भाग निकली थी।

आज फिर चमगादड़ अपने जलवे दिखा रहा था, और वह अपना मुँह ढाँपे, खिलखिलाती हुई मन ही मन उसे धन्यवाद दे रही थी—‘हे चमगादड़! तू ऐसे ही आते रहियो और डराने वालों पर अपनी दहशत फैलाते रहियो।’

लघुकथा-5
लघुकथा : मृगतृष्णा

दो दिन में ही नीतू ने गीतांजलि का मन मोह लिया था। हँसती तो मानो फूल झड़ते। अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी और कहाँ उसका पति सुमित, ऐसी पत्नी पाकर तो उसके भाग्य खुल गये।

आज नीतू वापिस जा रही थी। गीतांजलि उसके साथ उसे छोड़ने स्टेशन के लिए रवाना हो गयी। कार ड्राइव करते हुए वह उससे बातें भी करती जा रही थी।

“नीतू, तुम्हारे साथ दो दिन ऐसे बीते कि पता भी न चला। मालूम है? तुम्हारा जब फोन आया था कि तुम मुझसे मिलने आ रही हो तो मैं असमंजस में पड़ गई थी। “हे भगवान! ये मेरे पास क्यों आ रही है? हमारी तो ज्यादा मुलाकात भी नहीं है। वैसे भी मैं तुम्हारी दूर की जिठानी लगती हूँ।”

नीतू खिलखिला पड़ी। “भाभी, ये सब मैं नहीं जानती। हमारा तो सिर्फ प्यार का रिश्ता है। फिर, मैं आपको जी भर के देखना भी चाहती थी। कहकर वो चुप हो गयी।

“जी भर कर मुझे देखना…? समझी नहीं मैं।”

वह चुप थी।उसकी चुप्पी गीतांजलि को रहस्यमयी-सी लगने लगी। उसका अंर्तमन उसे कुरेदने लगा था, मगर वह स्टीयरिंग सम्हालने में लगी थी।

“नीतू, तुम कुछ कह रही थी न?”

“लीजिये भाभी, स्टेशन भी आ गया।”
कुली के साथ दोनों भागती हुई प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंँच गईं। ट्रेन आ चुकी थी। सामान जँचाकर नीतू जैसे ही अपनी बर्थ पर बैठी, सिग्नल ग्रीन हो गया।

“अच्छा नीतू! पहुँचकर फोन करना और सुमित को मेरा स्नेह बोलना।” कहते हुए गीतांजलि ने नीतू का हाथ अपने हाथ में ले लिया।

उसने भी कसकर उसका हाथ थाम लिया और प्यार भरी नगाहों से देखते हुए बोली, “आपका नाम सुनकर वो खुश हो जायेंगे…, आप जानना चाहती थीं न कि मैं आपको जी भरकर क्यों देखना चाहती थी? क्योंकि… ।“ कहते-कहते उसका गला रुंध गया ।

“हाँ-हाँ बोलो …।”

वह भर्राई हुई आवाज में बोली, “आपको नहीं मालूम, मैं जब से शादी होकर आई हूँ, सुमित के दिलोदिमाग में बस आप…। वो आपको चाहते हैं, मुझे नहीं।”

सुनते ही गीतांजलि ने झट से अपना हाथ अपनी ओर खींच लिया, मानो उसे बड़ी जोर से करेंट मार गया था। ट्रेन जा चुकी थी, मगर वह जहाँ के तहाँ खड़ी रह गयी।

पाँच लघुकथा

अनिता रश्मि


शोभना श्याम
लघुकथा-१
घुसपैठिए
“पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक अब तक पुलिस ने 938 अवैध घुसपैठियों को विदेशी पंजीकरण कार्यालय (FRRO) की मदद से डिपोर्ट कर दिया है. जबकि करीब 600 अवैध घुसपैठियों की पहचान होने के बाद उनके डिपोर्टेशन की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है।”
टीवी पर रात के समाचार में यह खबर सुनकर देवेंद्र जी बड़े उत्फुल्ल थे, मानो घुसपैठिए देश से नहीं, उनके घर से निकाले जा रहे हो। बिस्तर पर लेटते हुए पत्नी से बोले, “इस सरकार से यही उम्मीद थी, मधु जी। हमारे देश को धर्मशाला बनाया हुआ था इन्होंने। अब आया है ऊंट पहाड़ के नीचे ।”
“ये तो ठीक है जी, मगर ये लोग जायेंगे कहां?”
“जहां से आए थे, वहीं जाएंगे और कहां जाएंगे ..हमने ठेका लिया है इनका..?” कहते देवेंद्र जी खर्राटे भरने लगे ।
खर्राटे लेते अभी कुछ ही समय गुजरा था कि फोन की घंटी से उनकी नींद में खलल पड़ गई।
फोन उठाते ही बरस पड़े , “ये कोई समय है फोन करने का , सारी नींद खराब कर के रख दी। सुबह तक इंतजार नहीं कर सकते थे ।”
“पापा! आपको सोने की पड़ी है, यहां हम पर मुसीबत का पहाड़ टूट गया है। आप भूल रहे हैं कि, मै और माधवी ग्लोब के दूसरी ओर हैं!”
“सॉरी बेटा, क्या हुआ ? तू इतना घबराया हुआ क्यों है?”
“पापा! यहां इल्लीगल माइग्रेंट्स की धर-पकड़ शुरू हो गई है। सबको उनके देशों में डिपोर्ट किया जा रहा है। मैं तो बर्बाद हो गया पापाजी…एजेंट भी पैसे लेकर गायब हो चुका है।”
“हे भगवान, सत्यानाश हो उस सरकार का.. मधु जी ! हम तो लुट गए…बरबाद हो गए।”

लघुकथा-२
बख्शीश
एक तो उसने ऑटो रिक्शा वालों की आम प्रवृत्ति के विपरीत वाज़िब पैसे ही मांगे थे, दूसरे सवारी के बैठने वाले पिछले भाग में दोनों ओर पारदर्शी प्लास्टिक के परदे लगाए हुए थे, जो ऊपर और नीचे दोनों ओर से ऑटो के साथ अच्छी तरह बाँधे हुए थे । इस कारण रास्ते की धूल ओर हवा दोनों से ही बचाव हो गया था । दिन भर की थकन जैसे घर पहुँचने से पहले ही उतरनी आरम्भ हो गयी थी। आराम और तसल्ली के इस मूड में एक विचार मन में कौंधा कि घर पहुँच कर इसे किराये से दस रूपये अतिरिक्त दूँगी, आखिर इसने पर्दे लगाने पर जो पैसा खर्च किया है उसका फायदा तो इसमें बैठने वाले यात्रियों को ही हो रहा है न । यह विचार आते ही मुझे अपनी उदारता पर थोड़ा गर्व हो आया । मैंने मन ही मन इस किस्से के कुछ ड्राफ्ट बनाने शुरू कर दिए कि प्रत्यक्ष में तो ऑटो वाले की प्रशंसा हो जाये और परोक्ष में मेरा ये उदार कृत्य भी दूसरों तक पहुँच जाये ।
रास्ते में पड़ने वाले बाजार से जब मैंने दूध का पैकेट लेने के लिए ऑटो रोका तो ऑटो वाले ने फिर से अपनी सज्जनता का परिचय देते हुए मुझे ऑटो में बैठे रहने का इशारा किया और मुझसे पैसे लेकर स्वयं उतर कर दूध का पैकेट ला कर मुझे दे दिया। अब तो उसे बख्शीश देने का निर्णय और भी दृढ़ हो गया, साथ ही सुनाये जाने वाले किस्से में उसकी प्रशंसा के एक-दो वाक्य और जुड़ गए।
घर पहुँच कर मैंने पर्स में से किराये के लिए पचास रूपये का नोट निकालने के बाद जब दस का नोट और निकालना चाहा तो पाया कि मेरे पास छुट्टे रुपयों में बस बीस रुपये का एक नोट ही है, शेष सभी सौ और पाँच सौ के नोट थे । उदारता और व्यवहारिकता के बीच चले कुछ सेकेंड्स के संघर्ष में आखिरकार व्यवहारिकता के ये तर्क जीत गए कि माना किराया उसने ज्यादा नहीं मांगा लेकिन ऐसा कम भी तो नहीं हैं। देखा जाये तो मीटर से तो 40 रुपये ही बनते थे । वो तो ओला और उबर के आने से पहले मांगे जाने वाले अनाप-शनाप किराये के सामने मुझे पचास रूपये कम लग रहे हैं। पर्दों के कारण उसे दूसरों से सवारी ज्यादा मिलती होंगी और स्वयं दूध लाकर देने के पीछे उसकी मंशा समय बचाने की भी रही होगी क्योंकि मुझे पर्दा हटाने में अतिरिक्त समय लगता। इन तर्कों से आश्वस्त होते ही मेरे हाथ में आया बीस का नोट पर्स में ही छूट गया।

लघुकथा-३
समझौता
सुबह से लॉन में ड्यूटी बजाता धूप का टुकड़ा अब एक कोने में सिकुड़ कर सुस्ता ही रहा था कि शाम के आने की खबर मिली तो लॉन में लगे पेड़ की फुनगी पर जा बैठा | पूरा दिन अपनी बारी का इंतज़ार करती शिप्रा बार बार अपने मन में उस संकल्प को दोहरा रही थी कि आज इस नौकरी के लिए वह किसी भी समझौते से पीछे नहीं हटेगी |
छह महीने हो चुके हैं नौकरी के लिए ठोकर खाते, घर के हालात बद से बद्तर होते जा रहे हैं | इस बीच कई ‘शुभचिंतकों’ से गाहे बगाहे थोड़ा ‘ओपन’ होने की सलाह भी मिलती रही है| एक दो ने यहाँ तक कह दिया कि इस पुरानी हिंदी फिल्म की हीरोइन की तरह सती-सावित्री की इमेज से बाहर निकल आये तो नौकरियां चल कर उस तक आएँगी | और ये भी कि कोई खा नहीं जायेगा उसे …|
आखिरकार आज अपने संस्कारों को घर के बुरे हालात का वास्ता देकर जबरन अपनी अलमारी में बंद कर, डीप नेक की टॉप और मिनी स्कर्ट पहन कर इस इंटरव्यू के लिए आयी शिप्रा का दिल प्रार्थियों की बड़ी संख्या देखकर डूबने लगा था लेकिन उसने मन ही अपने कपड़ों और मेकअप को परखा ,समझौते के संकल्प को दोहराया | ‘शुभचिंतकों’ के अनुसार अपनी ‘लो-मिडिल क्लास की मानसिकता’ को तो पहले ही घर पर छोड़ कर आयी थी अतः एक आश्वस्ति पूरा दिन उसका हाथ पकडे उस के साथ बैठी उसकी बारी का इंतज़ार करती रही|
आखिरकार बिलकुल अंत में उसका नंबर आया तो उसने पूरे विश्वास से अंदर प्रवेश किया ,मोहक अदाओं के साथ इंटरव्यू में पूछे गए सारे प्रश्नों के उत्तर दिए | इतने में इंटरव्यू लेने वाले दो आदमियों में से एक उठ कर बाहर चला गया और दूसरा व्यक्ति ऑफिस में उसके काम के बारे में बताता हुआ उठ कर उसकी कुर्सी के ठीक सामने आकर मेज पर बैठ गया |शिप्रा अपनी धुकधुकी पर नियंत्रण करते हुए खुद को संयत रखने की पूरी कोशिश कर रही थी , अपने घटिया संकल्प को भी मन ही मन दोहराती जा रही थी, यकायक उस व्यक्ति ने बड़ी अज़ीब तरह से अपना हाथ उसके कंधे की ओर बढ़ाया , अब तक शिप्रा शायद समझ चुकी थी कि उसका नंबर सबसे आखिर में क्यों आया, सर्द मौसम के बावजूद उसके माथे पर पसीना छलक आया , वह एक झटके में उठी और सीधा बिल्डिंग से बाहर दौड़ती चली गयी |
बाहर आकर शिप्रा हैरान थी कि जिन संस्कारों को वह घर में बंद कर आयी थी वे यहाँ कैसे पहुँच गए और सारा दिन मन में बैठा संकल्प कब मुँह चुराकर भाग गया

लघुकथा-४
चिलमॉम !
बेटी के इस जुमले ‘चिल मॉम!’ ने चुंबक की तरह एक पल में शिल्पा की यादों की दराज़ से छब्बीस वर्ष पहले की उस घटना को खींच कर निकाल लिया |
जब शिल्पा कोई तेरह-चौदह वर्ष की थी और अपनी सबसे पक्की सहेली के घर खेल रही थी | ये वो जमाना था जब पंद्रह सोलह साल की उम्र में भी, और तमाम बदलावों के बावजूद भी बचपना शरीर में जिद्दी बनकर इस प्रकार फँसा होता था कि इक्कलदुक्कल, छुपमछुपाई जैसे खेल सड़कों से सिमट कर घर के आँगन और छतों पर तो आ जाते थे, लेकिन बंद नहीं होते थे |
वो दोनों भी अन्य सहेलियों के साथ छुपमछुपाई खेल रही थी | शिल्पा छत के एक कोने में अकेले बने एक कमरे में छिपी हुई थी कि किसी ने दरवाजा बाहर से बंद कर दिया | शिल्पा ने घबराकर दरवाजा पीटना शुरू कर दिया, लेकिन तब तक शायद बंद करने वाला नीचे जा चुका था |
शिल्पा बेहद घबरा चुकी थी, तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा ,मुड़कर देखा तो सहेली का बड़ा लेकिन थोड़ा मंद-बुद्धि भाई खड़ा था | शायद वह उस कमरे में बने स्टोर में था जिसकी वजह से शिल्पा छिपते समय उसे देख नहीं पाई | वह शिल्पा को एक बच्चे की तरह आलिंगन में लेकर ढाढ़स बंधाने लगा | उफ़ ये क्या हो गया | अब तक देखी गयी तमाम फिल्मों के दृश्य शिल्पा के मस्तिष्क में घूमने लगे | उसने एक झटके से खुद को उसके आलिंगन से छुड़ाया और दरवाजे को जोर से धकेला |संयोग से उसकी सहेली उसे ढूंढते आ पहुंची थी और दरवाजे का कुंडा खोल दिया था | शिप्रा तीर की तरह जो कमरे से निकली तो सीधा अपने घर जाकर ही रुकी | उसे ऐसा लग रहा था कि सारी दुनिया घूम रही है | अब कैसे मुँह दिखाएगी सबको|
फिल्मों के वो सारे संवाद, अपशब्द ,लांछन उसके कानों में हथोड़े बरसाने लगे |
शिल्पा की रातों की नींद, दिन का चैन सब उड़ चुका था | कुछ दिनों बाद उसे अपना पेट बढ़ता लगने लगा | सुबह मितली सी महसूस होती |
आखिर एक दिन शिल्पा ने हिचकियों और आंसुओं के बीच अपनी क्लास की सबसे बड़ी सहपाठी को सब कुछ बता दिया| पहले तो वह खूब हँसी फिर शिल्पा की दयनीय दशा पर तरस खाकर उसने आश्वासन दिया कि ऐसा कुछ नहीं है जिससे वह डर रही है| धीरे धीरे कुछ भेद उसपर खुलने लगे और संशय धूमिल होने लगे|
आज अपनी तेरह वर्षीय बेटी की स्कूल पिकनिक की तस्वीरों को देखते हुए वह तनिक गुस्से में भरकर कह उठी, “लड़को से इतना चिपक कर फोटो खिंचाते शर्म नहीं आती तुम्हें, ऊपर से फेसबुक पर डाल रही हो, लोग क्या सोचेंगे|”
“चिल मॉम, कुछ नहीं सोचेंगे! आजकल सब ऐसे ही फोटो खिंचाते है …..और ..,”वह फुसफुसाई, “इतने से मैं माँ नहीं बन जाऊंगी |”

लघुकथा-५
हौं तो धाय तिहारे सुत की
सफेद तौलिए में लिपटी मक्खन सी मुलायम नाजुक देह को उसकी जैविक मां तान्या को सौंपती हुई सुरुपा के हाथ कांप रहे थे ।
सौंपने की यह संक्षिप्त सी प्रक्रिया उसके लिए युगों से लंबी थी। इस दौरान वह तीन बार उसे वापस अपने कलेजे से लगा चुकी थी।
पेट में हौल, दिल में हूक, दिमाग में खलबली, छाती में दूध और आंखों में आंसू लिए सुरूपा उस घड़ी को कोस रही थी, जब उसने अपनी कोख को किराए पर देने का यह अमानवीय निर्णय लिया था।
जगन ने कहा भी था , “रुपयों का कोई और इंतजाम हो जाएगा सुरु, मेरी बीमारी ठीक करने के चक्कर में उम्र भर के पछतावे की बीमारी न पाल लेना।”
लेकिन सुरूपा को उस समय बस अपने जगन की जान बचाने के सिवा कुछ नहीं सूझ रहा था।
उसने जगन को यह कह कर चुप कर दिया कि जगन इस सौदे में यह बात अच्छी है कि बीज भी तान्या का होगा । भला मकान को किरायेदार से मोह होता है क्या ?”
तो अब इस किरायेदार के जाने पर मकान क्यों रो रहा है?
हाय रे दुर्भाग्य! जिसकी जान बचाने को कोख का सौदा किया उसे नामुराद कैंसर ने लील ही लिया। अब उस दुनिया में उसका कहलाने वाला कोई नहीं। जिस जान को अपने खून से सींचा,उस पर भी उसका अधिकार नहीं।
उसका बैंक का अकाउंट भरने का नोटिफिकेशन आ चुका था , मगर जिंदगी का अकाउंट तो खाली था ।
सुरूपा ने एक गहरी सांस भरी, जी कड़ा कर नवजात को तान्या को सौंपा। कमजोर तन और मन को घसीटते अपना सामान इकट्ठा किया , एक बार फिर निराश नजरों से अपने अंश को देखा और उफनते दूध को आंचल से ढकते हुए हस्पताल के मुख्य द्वार की ओर कदम बढ़ा दिए।
अचानक तान्या की आवाज आई, “रुको!”
सुरूपा पलटी, देखा तान्या की आँखें भी छलक रही थी।
“सुरूपा! आज नहीं तो कल मुझे काम पर जाना ही होगा। इस नई जान के लिए कोई आया भी रखनी ही होगी ।
… तो.. मै सोच रही हूँ कि तुमसे बेहतर इस चिराग को कौन रोशन रख सकता है।
इधर यह नन्ही जान बोतलों पर पले और इसके भाग्य का दूध उफन उफन कर सूख जाए ?
तो बताओ, देवकी के साथ साथ मेरे कान्हा की यशोदा भी बनोगी?”
हतप्रभ सुरूपा कुछ बोले इससे पहले एक दैवीय प्रेरणा से गूंजी नन्ही मुन्नी किलकारी ने इस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी ।

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